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सुरों की मंदाकिनी: दून में प्रवाहित हुई लता मंगेशकर की ‘गायकी की गंगा’

(शीशपाल गुसाईं )

देहरादून की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत में मंगलवार शाम एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया। जब दून लाइब्रेरी एवं रिसर्च सेंटर के सभागार में डॉ. इंद्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर’ पर चर्चा शुरू हुई, तो ऐसा लगा मानो गंगा की लहरें संगीत बनकर दून की वादियों में उतर आई हों। यह केवल एक पुस्तक विमोचन या परिचर्चा नहीं थी, बल्कि भारतीय संगीत की उस दिव्य परंपरा का उत्सव थी, जिसने पीढ़ियों की संवेदनाओं को स्वर दिए हैं।

एक साधक की तपस्या: कर्नलगंज (गोंडा )से मॉस्को तक

डॉ. इंद्रजीत सिंह महज एक सेवानिवृत्त प्राचार्य नहीं हैं, बल्कि वे शब्दों के उस पारखी शिल्पी हैं जिन्होंने शैलेंद्र जैसे महान गीतकार पर 22 वर्षों तक गंभीर शोध किया। कर्नलगंज (गोंडा उत्तर प्रदेश) की गलियों में सिनेमा के पर्दे को विस्मय से निहारने वाला वह बालक आज साहित्य और संगीत का चलता-फिरता विश्वकोश बन चुका है।

आईआईटी रुड़की से अर्थशास्त्र में पीएचडी करने वाले और रूस के प्रतिष्ठित “दोस्तोयेव्स्की अवार्ड” से सम्मानित डॉ. सिंह का व्यक्तित्व शिक्षा, संस्कृति और संवेदना की दुर्लभ त्रिवेणी है। उनकी वाणी में विनम्रता है, लेकिन शोध में अद्भुत गंभीरता। यही कारण है कि जब वे लता मंगेशकर की चर्चा करते हैं, तो वह केवल जानकारी नहीं रहती—वह एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है।

डॉ. सिंह लिखते हैं—
“लता की आवाज़ में फूलों का सुवास है और जिजीविषा का अमृत प्याला है। यह आवाज़ स्याह रातों में जुगनुओं की जगमगाहट और मासूम बच्चे की मुस्कुराहट की तरह है।”

साहित्यिक विभूतियों के उद्गार

​1. डॉ. जितेंद्र ठाकुर: “प्रमाणिकता का जीवंत दस्तावेज़”
प्रख्यात साहित्यकार डॉ. जितेंद्र ठाकुर ने डॉ. इंद्रजीत सिंह को “चलता-फिरता एनसाइक्लोपीडिया” की संज्ञा देते हुए कहा कि यह पुस्तक महज़ पन्नों का संग्रह नहीं, बल्कि एक कठिन शोध का परिणाम है। उन्होंने बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया कि इंद्रजीत की इस कृति की प्रमाणिकता इतनी सटीक थी कि उन्हें संशोधन की भी आवश्यकता नहीं पड़ी। ठाकुर के शब्दों में— “इस पुस्तक को केवल आँखों से पढ़ा नहीं, बल्कि अंतर्मन से सुना जाना चाहिए।”

​2. डॉ. सुधारानी पांडेय: “लता के व्यक्तित्व की आत्मा”
प्रसिद्ध साहित्यकार व पूर्व कुलपति डॉ. सुधारानी पांडेय का संबोधन संवेदनाओं से भरा था। उन्होंने 80 के दशक के उस स्वर्णकाल को याद किया जब गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उच्च कोटि का साहित्य थे। उन्होंने भावुक होकर कहा— “मराठी पृष्ठभूमि से आकर हिंदी गीत-संसार की आत्मा बन जाना कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी। इंद्रजीत ने लता के व्यक्तित्व की उसी आत्मा को शब्दों में उतार दिया है।”

​3. डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र: “सपनों को हकीकत बुनता लेखक”
अध्यक्षीय संबोधन में प्रतिष्ठित गीतकार व साहित्यकार डॉ. मिश्र ने इंद्रजीत को एक “स्वप्नद्रष्टा लेखक” बताया। उन्होंने एक मार्मिक वैश्विक प्रसंग साझा किया कि कैसे भाषा की सीमाओं को लांघकर लता जी की आवाज़ सुदूर जंगलों तक गूँजती है। उन्होंने कहा कि— “शैलेंद्र जैसे महान गीतकारों को साहित्य की मुख्यधारा में सम्मान दिलाना और भारत सरकार द्वारा इस पुस्तक का प्रकाशन होना, हिंदी साहित्य के लिए एक गौरवशाली उपलब्धि है।”

​4. अनिल रतूड़ी: “साधना और शुद्धता का सफर”
पूर्व पुलिस महानिदेशक अनिल रतूड़ी ने संगीत और भाषा के अंतर्संबंधों पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने दिलीप कुमार (यूसुफ साहब) के उस ऐतिहासिक प्रसंग को साझा किया, जिसमें लता के उच्चारण पर टिप्पणी की गई थी। रतूड़ी ने कहा— “उस एक टिप्पणी ने लता को साधना की उस ऊँचाई पर पहुँचा दिया, जहाँ वे उच्चारण और भाव की सर्वोच्च प्रतीक बन गईं। इंद्रजीत जी ने इन अनकहे प्रसंगों को बड़ी खूबसूरती से सहेजा है।”

कुशल संचालन: डॉ. सुशील उपाध्याय
​समारोह को एक सूत्र में पिरोने का महत्वपूर्ण कार्य डॉ. सुशील उपाध्याय ने किया। वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार, पत्रकार और प्रोफेसर के रूप में उनकी बहुआयामी प्रतिभा ने संचालन को एक नई ऊँचाई दी। डॉ. उपाध्याय की गंभीर और साहित्यिक भाषा-शैली ने पूरे आयोजन की गरिमा को अंत तक बनाए रखा और श्रोताओं को विमर्श से जोड़े रखा।

मंगलवार की ​यह शाम सिद्ध कर गई कि जब शब्द, स्वर और संवेदना का मिलन होता है, तो ‘गायकी की गंगा’ प्रवाहित होती है। डॉ. इंद्रजीत सिंह की यह कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए फिल्म संगीत के इतिहास को समझने का एक प्रामाणिक द्वार है।

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