ये देहरादून का ट्रैफिक तो बहुत ही पक्षपाती निकला

ये देहरादून का ट्रैफिक तो बहुत ही पक्षपाती निकला
राहुल गांधी के छात्रों की गूंज पर विनय केडी का करारा कटाक्ष
मैंने देहरादून के ट्रैफिक से पूछा, “भाई, तुम बड़े पक्षपाती निकले।”
ट्रैफिक बोला, “क्यों? मैंने क्या कर दिया?”
मैंने कहा, “तुम्हारी वजह से राहुल गांधी ( Rahul Gandhi ) के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की अनुमति रद्द हो गई। सरकार कह रही है कि वीकेंड पर परेड ग्राउंड में कार्यक्रम हुआ तो घंटाघर से लेकर राजपुर रोड तक जाम लग जाएगा।”
ट्रैफिक पहले तो ज़ोर से हँसा। फिर बोला, “लगता है सरकार ने मेरा नाम इस्तेमाल कर लिया। मैं तो बेचारा सड़क पर जाम लगाता हूँ, ये लोग दिमाग में जाम लगा रहे हैं।”
मैंने कहा, “लेकिन सरकार तो तुम्हारी बड़ी चिंता कर रही है।”
ट्रैफिक बोला, “अच्छा! फिर तो मुझे भी अपनी पुरानी डायरी निकालनी पड़ेगी। उसमें मैंने उन दिनों का हिसाब लिखा है जब इसी परेड ग्राउंड में बड़े-बड़े नेता आए थे।”
उसने डायरी खोली।
पहला पन्ना था… 18 मार्च 2017, शनिवार… स्थान: परेड ग्राउंड, त्रिवेंद्र सिंह रावत का मुख्यमंत्री पद का भव्य शपथ ग्रहण समारोह और लाखो लोगों की जनसभा।
दूसरे पन्ने पर… 5 अप्रैल 2019, शुक्रवार । स्थान: परेड ग्राउंड, प्रधानमंत्री की चुनावी सभा। लाखों लोग। गाड़ियों की कतारें। सुरक्षा। भीड़। इतनी भीड़ की अगले चार दिन तक सोशल मीडिया और सभी अखबारें “अपार जनसैलाब” से भरी रहीं ।
मैंने पूछा, “उस दिन कहाँ थे तुम ?”
ट्रैफिक बोला, “मैं वहीं था, लेकिन उस दिन मेरा नाम बदलकर ‘ऐतिहासिक जनसमर्थन’ रख दिया गया था।”
उसने तीसरा पन्ना पलटा… 30 अक्टूबर 2021, शनिवार… स्थान: परेड ग्राउंड, तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह द्वारा सहकारिता घसियारी कल्याण योजना के शुभारंभ के मौके पर परेड ग्राउंड में आयोजित विशाल जनसभा।
चौथे पन्ने पर… तारीख थी 4 दिसंबर 2021, शनिवार। वही वीकेंड, वही परेड ग्राउंड, वही देहरादून। प्रधानमंत्री की महा जनसभा।
मैंने पूछा, “उस दिन तो शनिवार भी था?”
वह बोला, “हाँ, लेकिन शनिवार सत्ता पक्ष का था। इसलिए मैं जाम नहीं, विकास कहलाया।”
पांचवे पन्ने पर… 12 फरवरी 2022, शनिवार… स्थान: परेड ग्राउंड, विधानसभा चुनाव के आखिरी दौर के प्रचार के लिए भाजपा के फायरब्रांड नेता और स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ की परेड ग्राउंड में बेहद चर्चित जनसभा।
हर पन्ने पर भीड़ थी, वाहन थे, पुलिस थी, बैरिकेड थे और वही सड़कें थीं। सिर्फ एक चीज़ गायब थी… आज वाला “सरकारी तर्क”।
मैंने ट्रेफ़िक जाम से कहा, “तो इसका मतलब तुम तब जाम नहीं लगाते थे?”
वह मुस्कराया। बोला, “मैं तो हर बार उतना ही लगता था। फर्क सिर्फ इतना था कि तब मुझे कैमरे ऐसे दिखाते थे कि भीड़ दिखाई दे और सड़क न दिखाई दे। आज बात विपक्ष की है तो सड़क दिखाई जा रही है ताकि भीड़ न दिखाई दे।”
इसके अलावा भी उसकी डायरी में बीसियों तारीखें दर्ज थीं। हर तारीख के सामने एक नया वी.वी.आई.पी. दौरा, एक नया जीरो ज़ोन और एक नया डायवर्टेड ट्रैफिक प्लान लिखा था। नीचे छोटे-छोटे अक्षरों में आम जनता की गवाही भी दर्ज थी… किसी की ट्रेन छूट गई, कोई घंटों एम्बुलेंस में फँसा रहा, किसी की बोर्ड परीक्षा का पेपर छूटते-छूटते बचा, किसी मरीज की डाक्टर/अस्पताल की अपॉइंटमेंट निकल गई, किसी की फ्लाइट पकड़ने की हड़बड़ी सड़क पर ही दम तोड़ गई।
दुकानदार पूरे दिन ग्राहक का इंतज़ार करते रहे क्योंकि ग्राहक पुलिस के बैरिकेड पर ही लौट गए। दफ़्तर जाने वाले लोग शहर का आधा चक्कर काटकर शाम तक दफ़्तर पहुँचे, और स्कूल से बच्चों को लेने निकले माँ-बाप मोबाइल पर बस यही पूछते रहे… “बेटा, अभी स्कूल में ही रुकना, नेता जी निकल जाएँ तो आते हैं।” ट्रैफिक ने हाशिए पर एक टिप्पणी भी लिख रखी थी… “जब सत्ता का काफ़िला चलता है तो जनता को सड़क पर चलने का अधिकार कुछ घंटों के लिए अवकाश पर भेज दिया जाता है। तब इस असुविधा का नाम ‘सुरक्षा व्यवस्था’ होता है; और जब विपक्ष का कार्यक्रम हो तो वही असुविधा अचानक ‘जनहित’ बन जाती है।”
इतने में परेड ग्राउंड भी बोल पड़ा। उसने कहा, “मेरे साथ भी बड़ा अन्याय होता है। जब सत्ता पक्ष सभा करता है तो मैं लोकतंत्र का केंद्र कहलाता हूँ। विपक्ष सभा करना चाहे तो अचानक मैं शहर का वो केंद्र बन जाता हूं जो कि ट्रैफिक का सबसे बड़ा अपराधी है। मैं वही मैदान हूँ, मेरी मिट्टी वही है, मेरा आकार वही है, मेरे चारों ओर की सड़कें भी वही हैं। बदलता सिर्फ इतना है कि मंच पर कौन खड़ा है। यदि भीड़ सत्ता पक्ष की हो तो उसे जनसमर्थन कहते हैं। यदि भीड़ विपक्ष की हो तो उसे ट्रैफिक समस्या कहते हैं। यदि मंच पर सरकार हो तो भीड़ लोकतंत्र का उत्सव होती है। यदि मंच पर विपक्ष हो तो वही भीड़ कानून-व्यवस्था की चुनौती बन जाती है।”
मुझे पहली बार समझ आया कि हमारे यहाँ मैदान भी निष्पक्ष नहीं होते, सड़कें भी निष्पक्ष नहीं होतीं और शायद तर्क भी निष्पक्ष नहीं होते। वे सब सत्ता के साथ नौकरी करते हैं। सुबह एक नियम लागू होता है, शाम तक वही नियम दूसरी वर्दी पहन लेता है। वैसे भी लोकतंत्र में सबको बराबरी का अधिकार है। कुछ लोगों को मैदान मिलने का अधिकार। और कुछ लोगों को मैदान न मिलने का अधिकार। इसे ही शायद “समान अवसर” कहते हैं।
सरकारें भी अजीब होती हैं। उन्हें रोज सड़कों पर फ़सीं हजारों गाड़ियाँ नहीं डरातीं, लेकिन मैदान में एक दिन बैठे हजार छात्र बेचैन कर देते हैं। क्योंकि गाड़ियाँ हॉर्न बजाती हैं, छात्र सवाल पूछते हैं।
सरकार का ट्रैफ़िक जाम वाला तर्क सुनकर मुझे अपने गाँव का वह बुज़ुर्ग याद आ गया, जिसका कुत्ता रात भर भौंकता रहता था, किसी को चैन से सोने नहीं देता था, लेकिन अगर पड़ोसी का कुत्ता भौंकने लग जाये तो वो बुजुर्ग अगले दिन पंचायत बुला लेता था… पूछने पर कहता था कि “मेरा कुत्ता पूरी रात चौकीदारी करता है और पड़ोसी का कुत्ता ख़ामख़ां भौंकता है हमको सोने नहीं देता है”। उस समय हमें लगता था कि बूढ़ा बड़ा चालाक है। अब लगता है कि वह अपने समय से बहुत आगे का आदमी था। शायद आज होता तो पक्का किसी मुख्यमंत्री का सलाहकार होता।
लोकतंत्र में बहाने भी बड़े लोकतांत्रिक हो गए हैं। पहले विरोध की आवाज़ दबानी होती थी तो साफ़-साफ़ मना कर दिया जाता था। अब विरोध को नहीं रोका जाता, ट्रैफिक को आगे कर दिया जाता है। आदेश सत्ता देती है, लेकिन बदनाम सड़क हो जाती है। निर्णय राजनीति करती है, लेकिन दोष परेड ग्राउंड के चौराहे पर खड़े बेचारे ट्रेफ़िक-सिपाही के सिर मढ़ दिया जाता है। सरकार ने सिक्का उछालने से पहले दोनों तरफ़ “हेड” खुदवा दिया है ।
अब डर इस बात का है कि कहीं आने वाले दिनों में चुनाव आयोग यह घोषणा न कर दे कि लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है, बस मतदाता घर से बाहर न निकलें क्योंकि बाहर निकलने से ट्रैफिक जाम हो सकता है।