उत्तराखंड

फर्जी हमले का सच आया सामने, बेटे की साजिश ने तोड़ दी पूर्व मंत्री तिलक राज बेहड़ की आवाज़

सत्ता, संवेदना और शर्म… जब सच ने एक पिता की आवाज़ तोड़ दी

रुद्रपुर (विकास गुप्ता)।उत्तराखंड की राजनीति में हलचल मचाने वाला मामला जब सामने आया, तो वह केवल एक आपराधिक खुलासा नहीं था—यह एक पिता के टूटने, एक बेटे के भटकने और एक राजनीतिक परिवार की संवेदनाओं के बिखरने की कहानी बन गया।

उत्तराखंड के पूर्व कैबिनेट मंत्री और वर्तमान कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ के बेटे, रुद्रपुर नगर निगम के पार्षद सौरभ बेहड़ पर हुए कथित जानलेवा हमले की सच्चाई जैसे ही सामने आई, पूरे प्रदेश की राजनीति सन्न रह गई। जिस घटना को चार दिनों तक कानून व्यवस्था की नाकामी बताया जाता रहा, वह दरअसल पारिवारिक कलह से उपजी एक खौफनाक साजिश निकली—और वह भी खुद के खिलाफ।

कुछ दिन पहले सौरभ बेहड़ पर बाइक सवार तीन नकाबपोश युवकों द्वारा हमला किए जाने की खबर ने राजनीतिक हलकों में भूचाल ला दिया था। तिलक राज बेहड़ कांग्रेस के नेताओं के साथ सड़कों पर उतर आए थे, पुलिस और सरकार पर तीखे सवाल दागे जा रहे थे, कानून व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया जा रहा था। एक पिता बेटे के लिए दहाड़ रहा था—और पूरा प्रदेश सुन रहा था।

लेकिन आज…
आज वही पिता मीडिया के सामने खड़ा था—दहाड़ नहीं, शब्द नहीं—बस आंखों में शर्म और आवाज़ में टूटन।
उधम सिंह नगर के एसएसपी मणिकांत मिश्रा द्वारा किए गए खुलासे ने सब कुछ पलट दिया। पुलिस जांच में सामने आया कि सौरभ बेहड़ ने अपने मित्र इंदर नारंग के साथ मिलकर खुद पर हमला कराने की साजिश रची थी। घासमंडी निवासी इंदर नारंग ने पूछताछ में बताया कि परिवार की सहानुभूति पाने के लिए इस पूरी योजना को अंजाम दिया गया।

पुलिस ने हमले में शामिल वंश कुमार, बादशाह और दीपक सिंह को गिरफ्तार करते हुए उनके कब्जे से दो अवैध तमंचे, एक जिंदा कारतूस और एक चाकू बरामद किया। कानून ने अपना काम किया—लेकिन भावनाएं चकनाचूर हो गईं।

सच सामने आते ही कांग्रेस की चुप्पी भी गूंज बन गई। जो कल तक पुलिस पर हमलावर थे, वे आज मौन थे। और सबसे ज्यादा दर्दनाक दृश्य तब सामने आया, जब तिलक राज बेहड़ ने मीडिया के सामने कहा—
“मेरे बेटे की इस हरकत से मेरा सिर शर्म से झुक गया है। आज से मेरा उससे कोई रिश्ता नहीं है। मैं पुलिस से मांग करता हूं कि इस मामले में कठोर से कठोर कार्रवाई की जाए।”

ये शब्द किसी नेता के नहीं थे…
ये शब्द एक टूटे हुए पिता के थे।
यह मामला अब सिर्फ एक फर्जी हमले का नहीं रह गया है। सवाल अभी भी हवा में तैर रहे हैं—
क्या सच में यह सब सिर्फ पारिवारिक कारणों से हुआ?
या इसके पीछे कोई और दबा हुआ सच भी है?
फिलहाल इतना तय है कि आज यह घटना राजनीति से ज्यादा इंसानियत, रिश्तों और भरोसे पर सवाल खड़े कर गई है।
एक पिता टूट गया…
एक बेटा कटघरे में खड़ा है…
और पूरा प्रदेश देख रहा है कि सत्ता से परे, सच कितना निर्मम हो सकता है।

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