
उत्तराखंड की राजनीति में भूचाल
अंदरूनी जंग, बगावती सुर और 2027 का ट्रेलर
देहरादून । उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों अभूतपूर्व उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। कभी अंकिता हत्याकांड में वीआईपी एंगल को लेकर सियासत गरमाई, कभी किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया, तो कभी किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ के पुत्र पर हुए हमले और उसके खुलासे ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी। बीते एक महीने में राज्य की राजनीति ने कई रंग बदले, लेकिन अब जो लड़ाई सबसे ज्यादा सुर्खियों में है, वह है भाजपा की अंदरूनी जंग।
यह जंग है—गदरपुर से भाजपा विधायक और पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय बनाम मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी।
हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने एक बार फिर उधम सिंह नगर जिले को सत्ता संघर्ष के केंद्र में ला खड़ा किया है। राजनीतिक विश्लेषक इसे आने वाले विधानसभा चुनावों का ट्रेलर मान रहे हैं।
2022 से शुरू हुई दरार, जो आज दरार नहीं—दरिया बन चुकी है
इस सियासी कहानी को समझने के लिए हमें 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले लौटना होगा। भाजपा हाईकमान ने तब पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा जताते हुए उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला लिया। लेकिन पार्टी के भीतर ही एक प्रभावशाली गुट उनकी पुनः ताजपोशी रोकने के लिए सक्रिय हो गया।
परिणाम सबके सामने था—
भाजपा सत्ता में तो लौटी, लेकिन सीएम धामी अपनी खटीमा सीट हार गए।
यहीं से पार्टी के भीतर विरोधी गुट का जश्न शुरू हो गया। उन्हें लगा कि अब धामी का राजनीतिक अध्याय समाप्त हो चुका है। लेकिन राजनीति में अक्सर वही होता है, जिसकी कम से कम उम्मीद की जाती है।
हाईकमान का मास्टरस्ट्रोक और विरोधियों की सबसे बड़ी हार
भाजपा हाईकमान ने चुनावी हार के बावजूद धामी पर भरोसा बनाए रखा और उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। यह फैसला धामी विरोधी खेमे के लिए करारा झटका था।
झटका यहीं नहीं रुका।
मंत्रीमंडल गठन में पार्टी के दो दिग्गज—
हरिद्वार से मदन कौशिक और गदरपुर से अरविंद पांडेय—को बाहर कर दिया गया।
यह निर्णय इन नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर सीधा प्रहार था।
दोनों नेताओं ने लगातार कोशिशें कीं कि किसी तरह मंत्रिमंडल में वापसी हो जाए, लेकिन भाजपा हाईकमान में मजबूत पकड़ बना चुके धामी के आगे उनके सारे दांव विफल होते चले गए।
दिल्ली दरबार, अंदरखाने की साजिश और नाकाम कोशिशें
इसी दौरान भाजपा के भीतर एक और गुट सक्रिय हुआ, जो दिल्ली में बैठे एक प्रभावशाली नेता के इशारों पर धामी सरकार को कमजोर करने की रणनीति में जुट गया।
स्थानीय स्तर पर सरकार की खामियां गिनाई जाने लगीं, जिन्हें दिल्ली दरबार तक पहुंचाया गया। लक्ष्य एक ही था—
किसी भी कीमत पर धामी को सीएम की कुर्सी से हटाना।
लेकिन इस गुट की सबसे बड़ी कमजोरी बनी—
आपसी महत्वाकांक्षाएं।
नेता आपस में एकजुट नहीं रह सके और देखते-देखते चार साल गुजर गए। इस दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अधिक मजबूत होकर उभरे।
अब चुनाव करीब, तो फिर तेज हुई बगावत
जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, धामी विरोधी गुट एक बार फिर सक्रिय हो गया है। हालिया राजनीतिक घटनाओं को आधार बनाकर मुख्यमंत्री को कमजोर दिखाने की कोशिशें की गईं, लेकिन हर बार धामी की सधी हुई राजनीतिक टीम ने इन प्रयासों को नाकाम कर दिया।
इसी क्रम में गदरपुर विधायक अरविंद पांडेय के विरोध के सुर खुलकर सामने आने लगे।
खिचड़ी पॉलिटिक्स की आड़ में बड़े विरोध का संकेत देने की कोशिश की गई, लेकिन यह प्रयोग भी सफल नहीं हो सका।
उधम सिंह नगर बनेगा सियासी रणक्षेत्र
इसके बाद से ही अरविंद पांडेय अपनी ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर आ गए।
उधम सिंह नगर के भाजपा नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ऐसे में सबसे अधिक विधायकों वाले इस जिले का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
अब साफ है कि आने वाले समय में उधम सिंह नगर जिला उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा पावर सेंटर बन सकता है—
जहां से न केवल टिकटों का भविष्य तय होगा, बल्कि नेतृत्व की दिशा भी। यह सिर्फ शुरुआत है
फिलहाल जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह सिर्फ सियासी हलचल नहीं—
यह आने वाले विधानसभा चुनावों की पटकथा का पहला अध्याय है।
भाजपा के भीतर मची यह खींचतान तय करेगी कि उत्तराखंड की राजनीति किस करवट बैठेगी।
एक बात तय है—
उत्तराखंड की राजनीति अब शांत नहीं रहने वाली।