उत्तराखंड

उत्तराखंड में उपभोक्ता न्याय की स्थिति चिंता जनक

उत्तराखंड में उपभोक्ता न्याय की स्थिति चिंता जनक

देरी से केसों के निपटारें व राहत न मिलने से हतोत्साहित हो रहे हैं उपभोक्ता, केस फाइलिंग में भारी कमी

तीन माह में होना था निपटारा, 10 साल से अधिक से न्याय की आस में हैं विभिन्न उपभोक्ता

उत्तराखंड में उपभोक्ता न्याय की स्थिति चिन्ताजनक है। देरी से केसों के निपटारें व राहत न मिलने से उपभोक्ता हतोत्साहित हो रहे हैं और उपभोक्ता आयोगों की शरण लेने से ही उपभोक्ता बचने लगे हैं। जिन केसों का निपटारा तीन माह के अन्दर करने का प्रावधान है वह भी 10 साल से अधिक से फैसले के इंतजार में हैं। यह खुलासा उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग द्वारा सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन एडवोकेट को उपलब्ध करायी सूचना से हुआ है।

काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन एडवोकेट ने उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग के लोक सूचना अधिकारी से राज्य आयोग द्वारा राष्ट्रीय आयोग को भेजे गये राज्य व जिला आयोगों द्वारा किये गये उपभोक्ता केसों के निस्तारण सम्बन्धी विवरणी की सूचना चाही थी। राज्य आयोग की प्रशासनिक अधिकारी/लोक सूचना अधिकारी, वन्दना शर्मा ने अपने पत्रांक 121 से सम्बन्धित विवरणी की सत्यापित फोटो प्रति उपलब्ध करायी है।

नदीम को उपलब्ध वार्षिक विवरणी 2024 के अनुसार वर्ष 2024 मे राज्य आयोग में केवल 29 केस फाइल हुये जिसमें 26 प्रथम अपील तथा 3 उपभोक्ता शिकायतों सम्बन्धी केस शामिल हैं। राज्य आयोग ने वर्ष 2024 में फाइल हुये उपभोक्ता केसों से चार गुने 12 केसों का निपटारा किया जबकि 11 गुना से अधिक 290 प्रथम अपीलों का निपटारा किया। वर्ष के अन्त में राज्य आयोग में 844 प्रथम अपील तथा 62 उपभोक्ता शिकायतों सम्बन्धी केस लंबित है। प्रदेश के 13 जिलों के आयोगो में वर्ष 2024 में कुल 682 केस फाइल हुये जबकि मात्र 41 प्रतिशत 282 केसों का ही निपटारा हुआ जबकि 3985 उपभोक्ता केस लंबित हैं।

वर्ष वार केसों के लम्बित रहने के विवरण के अनुसार राज्य आयोग में वर्ष के अंत में लम्बित 62 उपभोक्ता केसों में से 9 दस वर्ष से अधिक से फैसले के इंतजार में हैं जबकि 18 दस वर्ष पुराने हैं, 28 सात वर्ष पुराने है 01 पांच साल पुराना, 02 दो वर्ष पुराने, 03 छः माह से एक वर्ष पुराने केस शामिल हैं।

राज्य आयोगों में जिला आयोगों के फैसले से असंतुष्ट पक्षकारों की लंबित 844 प्रथम अपीलों में 35 दस वर्ष से अधिक पुरानी हैं, 106 दस वर्ष पुरानी, 253 सात वर्ष पुरानी, 161 पांच वर्ष पुराने, 194 तीन वर्ष पुरानी, 81 दो वर्ष पुरानी, 13 छः माह से एक वर्ष पुराने, 12 छः माह से कम पुरानी अपीलें शामिल है।

वर्ष 2025 के प्रारम्भ में प्रदेश के 13 जिलों के जिला उपभोक्ता आयोगों में लम्बित 3985 उपभोक्ता केसों में 29 दस वर्ष से अधिक से फैसले के इंतजार में हैं, 75 दस वर्ष से, 310 सात वर्ष से, 653 पांच वर्ष से, 1339 तीन वर्ष से, 792 दो वर्ष से, 304 छः माह से एक वर्ष से, 427 छः माह से कम से फैसले के इंतजार में हैं।

देरी से केसों के निपटारे व उपभोक्ताओं को राहत न मिलने से उपभोक्ता हतोत्साहित हो रहे हैं और प्रदेश में उपभोक्ता आयोगो की शरण लेने वालों में लगातार कमी आ रही है।

नदीम को उपलब्ध विवरण के अनुसार वर्ष 2016 में 292 केस राज्य आयोग में फाइल हुये थे जबकि 2017 में 169 केस ही फाइल हुये। वर्ष 2018 में 292, वर्ष 2019 में 468, वर्ष 2020 में 170, वर्ष 2021 में 205, वर्ष 2022 में 322, वर्ष 2023 में कम होकर 116 तथा 2024 में पिछले 9 वर्षों में न्यूनतम 29 केस ही फाइल हुये हैं।

जिला आयोगों/जिला फोरमों की उपभोक्ताओं द्वारा शरण लेने में भी भारी कमी आयी हैं। वर्ष 2016 में 1462 केस फाइल हुये थे, वर्ष 2017 में कम होकर 1086, वर्ष 2018 में 1185, वर्ष 2019 में 1365, वर्ष 2020 में 1529, वर्ष 2021 में 1434, वर्ष 2022 में 1859, वर्ष 2023 में 970 तथा वर्ष 2024 में नौ वर्षों में न्यूनतम 682 केस ही जिला आयोगों में फाइल हुये हैं।

उपभोक्ता संस्था माकाक्स के केन्द्रीय अध्यक्ष व सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन एडवोकेट ने बताया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 तथा इससे पूर्व में लागू उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में प्रयोगशाला में परीक्षण वाले केसों का निपटारा पांच माह में, अन्य सभी उपभोक्ता केसों का निपटारा तीन माह में करने का प्रावधान हैं लेकिन अधिकतर केसों का निपटारा उक्त तय समय सीमा में नहीं हो रहा हैं। शीघ्र न्याय न मिलना न्याय से इंकार की श्रेणी में आता हैं।

इसके अतिरिक्त उपभोक्ता संरक्षण के लिये बने आयोगों/फोरमों के विभिन्न फैसलों में उपभोक्ता को कम, विपक्षियों को ज्यादा राहत मिलने की घटनाये सामने आयी है। इसलिये प्रदेश में उपभोक्ताओं का शोषण तो लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उपभोक्ता आयोगों की शरण लेने से उपभोक्ता बच रहे हैं। इसके लिये राष्ट्रीय व राज्य आयोगों को अपनी अधीक्षण शक्तियों का प्रयोग करके उपभोक्ताओं को न्याय सुनिश्चित कराना चाहिये। इसके लिये माकाक्स भी राष्ट्रीय व राज्य आयोगों से अनुरोध करेगी।

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