ब्यूरोक्रेसी

सशक्त उत्तराखंड@25 चिंतन शिविरः क्या सीख लेंगी अफसरशाही

अफसरों के ढर्रे से न सीएम संतुष्ट और न सीएस

फैसले लेने से हिचकते क्यों हैं अधिकारीः धामी

नो कहने वाले अफसर अब लें वीआरएसः संधू

अतुल बरतरिया

देहरादून। मसूरी में तीन दिन तक चसे सशक्त उत्तराखंड@25 चिंतन शिविर में यूं तो तमाम बातें हुईं। लेकिन इस मंथन से एक अहम बात ये निकली कि अफसरशाही के ढर्रे से न तो सरकार के मुखिया पुष्कर सिंह धामी संतुष्ट हैं और न ही शासन के मुखिया डॉ. एसएस संधू। दोनों ने अपने-अपने अंदाज में अफसरों को आइना दिखाया। अब देखने वाला बात यह होगी कि अफसरशाही इस पर ध्यान देकर अपने सुधारती है या फिर नसीहत को इस कान से सुनकर दूसरे से निकाल देती है।

सीएम धामी ने अपने संबोधन में कहा कि मैंने महसूस किया है कि विभाग अपनी जिम्मेदारी एक दूसरे पर डालने की कोशिश करते हैं, इस प्रवृत्ति को हमें त्यागना होगा। हमने सरलीकरण का मंत्र दिया है। सोचना होगा कि कितने विभागों ने कार्य का सरलीकरण कर समाधान का रास्ता निकलना है।

उन्होंने कहा कि मैं ज्यादा से ज्यादा जनता के बीच रहने की कोशिश करता हूं। अभी कुछ दिनों से आदत बनाई है कि जिलों में भ्रमण के दौरान सुबह 6 से 8 बजे तक लोगों से बात करता हूँ और फीडबैक लेता रहता हूं और इस दौरान सबके बारे में पता चलता रहता है। देखने में आता है कि कई अधिकारी फ़ाइल को ठीक से आगे नहीं बढ़ाते। ये आदर्श स्थिति नहीं है। कई दफा हम अपने स्तर से फैसले नहीं लेते। फ़ाइल नीचे से चलते हुए कई बार मेरे पास तक आ जाती है जिस पर सभी की एक ही टिप्पणी होती है कि उच्च अनुमोदन हेतु प्रेषित। जबकि जरूरत यह है कि हम अपना निर्णय भी उस पर लिखें। हमारी काम प्रणाली में बदलाव की जरूरत है। एसीआर भरे जाने के समय यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जो टास्क दिया गया था वो हुआ या नहीं।हम इस कार्य को इसी वर्ष से प्रारंभ करेंगे।

इधर, मुख्य सचिव डॉ. संधू ने कहा कि कई बार देखने में आता है कि अफसर फैसले लेने से डरते हैं और यस के बजाए नो कहने में अधिक दिलचस्पी लेते हैं। ऐसी सोच रखने वाले नौकरशाहों को स्वैच्छिक रिटायरमेंट ले लेना चाहिए। अगर कोई शासनादेश या नियम किसी विकास योजना या अच्छे कार्य में आड़े आ रहा है तो उसको बदलना चाहिए। सरकारी आदेशों को आम भाषा एक व्यक्ति क़ानून को मिसयूज न कर पाए इस सोच के चलते 99 लोगों को फायदा न होने देने की सोच गलत है। उन्होंने कहा कि नौकरशाह एक मुद्दा रोज लें कर फिर उसको सुलझाएं। उन्होंने कहा कि कायर नौकरशाह ही ज्यादा आपत्ति लगाते हैं। किसी चीज पर फैसला न लेना ही जनता को परेशान करने के समान है।

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