पर्यटन के नाम पर हुड़दंग का अहंकार, कब तक सहेगा पहाड़ यैसा व्यवहार ?

पर्यटन के नाम पर हुड़दंग का अहंकार,
कब तक सहेगा पहाड़ यैसा व्यवहार ?
जब पर्यटन और तीर्थाटन संयमित और व्यावहारिक था,
तब भी हम कोदा-झँगोरा खाकर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे थे।
उत्तराखंड।
विगत कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर हिमाचल और उत्तराखंड के स्थानीय निवासियों और बाहरी राज्यों (विशेषकर हरियाणा व दिल्ली-एनसीआर) के पर्यटकों के बीच तीखी नोकझोंक और हाथापाई के वीडियो तैर रहे हैं। इन घटनाओं के बाद इंटरनेट की दुनिया में एक बड़ा ही अजीब और भ्रामक नैरेटिव सेट करने की कोशिश की जा रही है। कुछ लोग और समूह यह प्रचारित कर रहे हैं कि इन दोनों पर्वतीय राज्यों का चूल्हा तो हमारे राज्यों के पर्यटकों के पैसों से चलता है। सोशल मीडिया पर बाकायदा अपीलें की जा रही हैं कि इन राज्यों में जाना बंद कर दो, ताकि इन्हें इनकी औकात समझ आ जाए।
यह नैरेटिव न केवल भ्रामक है, बल्कि पहाड़ के आत्मसम्मान पर एक सीधा प्रहार है। अपनी हरकतों पर पर्दा डालने के लिए दोष दूसरों के मढ़ देना एक सोची-समझी रणनीति बन चुका है। हम यह बिल्कुल नहीं कहते कि हर विवाद में केवल पर्यटक ही दोषी होता है । स्थानीय नागरिक या व्यवसायी भी गलत हो सकता है। कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यटन के नाम पर किसी को स्थानीय संस्कृति, लोक-मान्यताओं और मर्यादाओं को तार-तार करने की छूट दी जा सकती है?
पर्यटन और हुड़दंग में फर्क
रतन सिंह असवाल
आज गंगा के पावन तटों, बद्रीनाथ-केदारनाथ के रास्तों और संवेदनशील ग्लेशियरों पर जो कुछ दिख रहा है, उसे पर्यटन या तीर्थाटन कहना पर्यटन शब्द का अपमान है। यदि हरियाणा, यूपी, राजस्थान या दिल्ली से गाड़ियों के काफिले लेकर आने वाले और केवल रील बनाने के लिए ग्लेशियरों का चीरहरण करने वाले हुड़दंगियों को आप यात्री मान रहे हैं, तो हमें ऐसे पर्यटकों की कतई आवश्यकता नहीं है।
गंगा की लहरों के बीच हुक्का पीना, देवस्थलों के समीप तेज संगीत पर अश्लील थिरकन, संवेदनशील पर्यावरण में गाड़ियाँ दौड़ाना और विरोध करने पर स्थानीय बुजुर्गों या युवाओं पर धौंस जमाना, यह पर्यटन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का सांस्कृतिक बलात्कार है। एक सच्चा यात्री और श्रद्धालु प्रकृति का सम्मान करता है, वह शांत भाव से आता है, शीश झुकाता है और आशीर्वाद लेकर लौट जाता है। लेकिन आज का कंटेंट क्रिएटर पर्यटक केवल अपनी रील चमकाने और अहंकार की नुमाइश करने आता है।
मेहमान को अहंकार का नहीं, मर्यादा का ख़याल रखना होगा,
पहाड़ के लोग स्वभाव से बेहद शांत, सहिष्णु और अतिथि देवो भव: की भावना को जीने वाले होते हैं। वे अपने संकुचित संसाधनों में भी मेहमान को पलकों पर बिठाते हैं। लेकिन इस मेहमाननवाज़ी को कमजोरी समझने की भूल भारी पड़ रही है। जब पर्यटकों का व्यवहार स्थानीय महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाने लगे, सदियों पुरानी लोक-मान्यताओं का मज़ाक उड़ाने लगे, तो शांत पहाड़ का भी सुलगना स्वाभाविक है।
सीधा और सरल नियम है । आप किसी के घर में मेहमान बनकर जा रहे हैं, तो नियम घर के मालिक के चलेंगे, मेहमान के अहंकार के नहीं। अगर पर्यटन से इन राज्यों को राजस्व मिलता है, तो उसकी भारी कीमत यहाँ का पर्यावरण, यहाँ की नदियाँ, यहाँ के पहाड़ और यहाँ का जनजीवन भुगतता है।
संख्या नहीं, गुणवत्तापूर्ण पर्यटन की दरकार,
अब समय आ गया है कि हिमाचल और उत्तराखंड, दोनों राज्यों की सरकारों और प्रशासनों को केवल पर्यटकों की संख्या (Footfall) गिनना बंद करना होगा। हमें संख्या नहीं, गुणवत्तापूर्ण और जिम्मेदार पर्यटन चाहिए। पर्वतीय राज्यों के प्रवेश द्वारों पर ही सख्त चेकिंग और सांस्कृतिक ओरिएंटेशन होना चाहिए। प्राकृतिक और धार्मिक स्थलों पर हुड़दंग करने, गंदगी फैलाने या मर्यादा तोड़ने वालों पर इतने कड़े जुर्माने और कानूनी कार्रवाई हो कि वे दोबारा ऐसी हिमाकत न करें। रील्स के चक्कर में सुरक्षा और पर्यावरण को खतरे में डालने वालों को तुरंत जेल की हवा खिलाई जानी चाहिए।
कोदा-झँगोरा का स्वाभिमान
इस भ्रामक नैरेटिव को गढ़ने वाले और चूल्हा बंद करने की धमकी देने वाले अहंकारी तत्वों को यह बात कान खोलकर सुन लेनी चाहिए कि पहाड़ कभी किसी की खैरात पर निर्भर नहीं रहा। जब पर्यटन और तीर्थाटन संयमित और व्यावहारिक था, तब भी हम कोदा-झँगोरा खाकर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे थे। देश-दुनिया को बौद्धिक ज्ञान देने के साथ-साथ अपनी पाक-कला का लोहा मनवा रहे थे। आज भी हम वही कोदा-झँगोरा खाकर अपनी विरासत को आगे बढ़ा लेंगे, लेकिन अपनी संस्कृति और लोक-मान्यताओं को सरेबाज़ार नीलाम नहीं होने देंगे।
पहाड़ी राज्यों को ऐसे हुड़दंगियों की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है जो यहाँ की शांति, पवित्रता और अस्मिता को भंग करें। यदि आप मर्यादा और सम्मान के साथ आ सकते हैं, तो आपका स्वागत है। अन्यथा पहाड़ अपने स्वाभिमान के साथ जीना कल भी जानता था और आज भी जानता है। दोनों पर्वतीय राज्य उन ताकतों के आजीवन ऋणी रहेंगे जो इन हुड़दंगियों पर्वतीय राज्यों के प्राकृतिक संसाधनों, स्थानीय लोक संस्कृति और लोक मान्यताओं के चीर-हरण करने से रोकने में मदद करेंगी।