उत्तराखंड

उत्तराखंड में जलवायु संकट पर तीसरी रिपोर्ट जारी, 2025 के 98 प्रमुख डिजास्टर और 5 रेड फ्लैग चिन्हित

मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ के तीसरे संस्करण में क्लाइमेट चेंज, कम्युनिटीज और कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स का आपसी संबंध

2025 में उत्तराखंड की 98 प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स का विश्लेषण; हिमालयी राज्य के लिए पांच गंभीर रेड फ्लैग चिन्हित

देहरादून।

एसडीसी फाउंडेशन और मेसर्स बिशेन सिंह महेंद्र पाल सिंह द्वारा प्रकाशित ‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ के तीसरे संस्करण का आज दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में लोकार्पण किया गया। “कम्युनिटीज एंड कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स इन द टाइम्स ऑफ क्लाइमेट क्राइसिस” थीम पर केंद्रित यह पुस्तक उत्तराखंड के विकास और डिजास्टर नैरेटिव के संदर्भ में क्लाइमेट चेंज, कम्युनिटीज और कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स के आपसी संबंधों को सामने लाती है।

‘मेकिंग मोलहिल्स ऑफ माउंटेन्स’ सीरीज की यह तीसरी पुस्तक वर्ष 2025 में उत्तराखंड में आई प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव के तहत जनवरी से दिसंबर 2025 तक तैयार की गई 12 मंथली रिपोर्ट्स में शामिल 98 प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स की न्यूज रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया गया है। एसडीसी फाउंडेशन ने इससे पहले 2023 में ‘डिमिस्टिफाइंग डिजास्टर्स इन देवभूमि उत्तराखंड’ और 2024 में ‘टेल्स ऑफ उत्तराखंड्स क्लाइमेट क्राइसिस एंड एन अनसर्टेन डेवलपमेंट मॉडल’ प्रकाशित की थीं।

2025 की पुस्तक की फोरवर्ड लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के पूर्व निदेशक डॉ. संजीव चोपड़ा ने लिखी है। वर्ष 2025 की प्रमुख क्लाइमेट डिजास्टर्स के विश्लेषण से उत्तराखंड में बार-बार सामने आ रहे पांच प्रमुख रेड फ्लैग या पैटर्न चिन्हित किए गए हैं।

पहला रेड फ्लैग “डिजास्टर प्रिवेंशन में क्रॉनिक एडमिनिस्ट्रेटिव डिले, फ्रैगमेंटेड गवर्नेंस और अकाउंटेबिलिटी डेफिसिट” है, जिसका विश्लेषण मानव संसाधन विकास के पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने किया है। दूसरा रेड फ्लैग “अर्बन और सेमी-अर्बन डिजास्टर लैंडस्केप्स का उभरना” है, जिस पर अर्बन थिंकर और आर्किटेक्ट जगन शाह ने लिखा है।

तीसरा रेड फ्लैग “ग्लेशियल लेक्स, क्रायोस्फियर चेंज और इल्यूजन ऑफ प्रिपेयर्डनेस” है, जिसका विश्लेषण वाडिया इंस्टीट्यूट के डॉ. मनीष मेहता ने किया है। चौथा रेड फ्लैग “इंफ्रास्ट्रक्चर-इंड्यूज्ड डिजास्टर रिस्क और क्राइसिस ऑफ मोबिलिटी” है, जिस पर डॉ. लोकेश ओहरी ने लिखा है। पांचवां रेड फ्लैग “फ्रेजाइल हिमालयन लैंडस्केप पर मास टूरिज्म का इकोलॉजिकल बर्डन” है, जिसका विश्लेषण एक्वाटेरा एडवेंचर्स के वैभव काला ने किया है।

पुस्तक में “थर्ड सी — कॉन्स्टिट्यूशन” पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। उत्तराखंड की विकास संबंधी चुनौतियों के लीगल और कॉन्स्टिट्यूशनल आयामों को समझने के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण शामिल किए गए हैं। यूपीईएस यूनिवर्सिटी के आदित्य रावत ने पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड में एनवायरनमेंटल लॉज और लेजिस्लेशन पर लिखा है, जबकि यूपीईएस यूनिवर्सिटी के गौतम कुमार ने उत्तराखंड के संदर्भ में डिलिमिटेशन और राज्य की लगातार जारी माइग्रेशन की समस्या का विश्लेषण किया है। प्रेरणा रतूड़ी ने एक हिल स्टेशन की लोकल रेजिडेंट के रूप में अपने जीवन के अनुभवों पर आधारित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।

कार्यक्रम का स्वागत संबोधन दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के चंद्रशेखर तिवारी ने किया और कार्यक्रम का संचालन एसडीसी फाउंडेशन के दिनेश सेमवाल ने किया।

पुस्तक का परिचय एडिटर प्रेरणा रतूड़ी ने दिया, जबकि अनूप नौटियाल ने उत्तराखंड के डेवलपमेंट नैरेटिव में क्लाइमेट चेंज, कम्युनिटीज और कॉन्स्टिट्यूशनल कंसर्न्स को मेनस्ट्रीम करने की आवश्यकता पर बात रखी। पुस्तक के कॉन्ट्रिब्यूटर्स डॉ. मनीष मेहता, डॉ. लोकेश ओहरी और गौतम कुमार ने अपने-अपने लेखों में उठाए गए प्रमुख मुद्दों पर विचार साझा किए। अभिमन्यु गहलोत ने वोट ऑफ थैंक्स दिया।

लोकार्पण कार्यक्रम में स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी, श्री गुरु राम राय यूनिवर्सिटी, सरदार भगवान सिंह यूनिवर्सिटी, क्वांटम यूनिवर्सिटी, दून बिजनेस स्कूल, तुलाज़ यूनिवर्सिटी, उत्तरांचल यूनिवर्सिटी, डीआईटी यूनिवर्सिटी और दून यूनिवर्सिटी के बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स और फैकल्टी मेंबर्स शामिल हुए।

कार्यक्रम में सिविल सोसायटी के कई प्रमुख सदस्य भी उपस्थित रहे, जिनमें विभा पुरी दास, आलोक लाल, जेपी मामगाईं, कृपा नौटियाल, जगमोहन मेहदिरत्ता, अभिमन्यु, अविनाश चंद्र जोशी, बिनीता शाह, पियूष रौतेला, मेजर राहुल जुगरान, देवेंद्र बुडाकोटी, आशुतोष कंडवाल, रवि जूयाल, राकेश कपूर, पारुल, राज मोहन, कुणाल उनियाल परमजीत कक्कड़​, नरेंद्र सेठी, पवन लचंद, अनुपम त्रिवेदी सहित कई पीएचडी स्टूडेंट्स और यंग रिसर्चर्स शामिल थे।

एडिटर्स ने कहा कि क्लाइमेट चेंज, कम्युनिटीज और कॉन्स्टिट्यूशन के बीच संबंधों पर उत्तराखंड में और अधिक डायलॉग और डिस्कशन की जरूरत है। उन्होंने एक्सपर्ट्स, सिविल सोसायटी के सदस्यों, रिसर्चर्स और युवाओं से आगे आकर अपने विचार साझा करने तथा उत्तराखंड के लिए भविष्य की एक अधिक सस्टेनेबल और अकाउंटेबल दिशा तय करने में योगदान देने का आह्वान किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button