उत्तराखंड

छात्र आंदोलनों ने विश्व राजनीति को बार-बार बदला है!

छात्र आंदोलनों ने विश्व राजनीति को बार-बार बदला है!

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रहे प्रमोद शाह का अपना नजरिया

छात्र आंदोलन का एक कमजोर पक्ष यह होता है कि उसका कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं होता लेकिन उत्साह भरपूर होता है,इसलिए एक पहाड़ी बरसाती नदी की तरह है इसके बहाव और खतरों का आंकलन करने में सरकारें अक्सर चूक जाती है।

ये आंदोलन अक्सर युवा ऊर्जा, आदर्शवाद और असंतोष से पैदा होते हैं और सरकारों को उखाड़ फेंकने, नीतियां बदलने या लोकतंत्र मजबूत करने में हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं।

19वीं-20वीं सदी की शुरुआत दुनिया में तथा भारत में किस प्रकार छात्र आंदोलनो ने आकार लिया उसकी एक संक्षिप्त इतिहास निम्न प्रकार समझ सकते हैं

यूरोप (1848 की क्रांतियां): छात्र और बुद्धिजीवियों ने यूरोप भर में राष्ट्रवाद और उदारवाद की मांग की,युद्ध से तंग आ चुके यूरोप में राष्ट्र के नवनिर्माण में छात्रों ने जनमत तैयार किया ,जिनके आधार पर भविष्य की स्थाई सरकारें बनी,..।

रूस (1905): छात्रों ने Tsarist शासन के खिलाफ प्रदर्शन किए, जिसे 1917 की बोल्शेविक क्रांति का आधार बने।

1960 का दशक — वैश्विक उथल-पुथल

मई 1968, फ्रांस: पेरिस में छात्रों का आंदोलन (Sorbonne University) मजदूरों के साथ जुड़ा। राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल की सरकार लगभग गिर गई। इससे सामाजिक-यौनिक क्रांति, शिक्षा सुधार और वामपंथी राजनीति को नई दिशा मिली। जो विश्वव्यापी प्रेरणा बना।

अमेरिका (1960-70): नागरिक अधिकार आंदोलनऔर वियतनाम विरोधी छात्र आंदोलन जिसने अमेरिका की युद्ध नीति बदल दी इससे युद्ध नीति प्रभावित हुई, युवा मताधिकार बढ़ा और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए।

1970-90 के दशक

ईरान (1979): छात्रों ने शाह के खिलाफ आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई, इस्लामिक क्रांति हुई।

पूर्वी यूरोप:

चेकोस्लोवाकिया में

1989 Velvet Revolution (चेक गणराज्य) और अन्य पूर्वी ब्लॉक देशों में छात्र आंदोलनों ने कम्युनिस्ट शासन का अंत किया और लोकतंत्र स्थापित किया।

तियानानमेन स्क्वायर (1989, चीन): छात्रों का लोकतंत्र आंदोलन क्रूरता से कुचला गया,यद्यपि इससे कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ लेकिन चीन की राजनीति और विश्व धारणा पर गहरा असर पड़ा।

अरब स्प्रिंग (2010-12): ट्यूनीशिया में एक छात्र/युवा के आत्मदाह से शुरू होकर मिस्र, लीबिया, यमन आदि में तानाशाही उखाड़ फेंकी गई। कई देशों में सरकारें बदलीं, हालांकि परिणाम मिश्रित रहे ।

भारत में छात्र आंदोलन का बहुत प्रभावशाली इतिहास रहा है1942 भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब कांग्रेस की टॉप लीडरशिप गिरफ्तार कर ली गई थी ,तब छात्रों ने हीआजादी के इस आंदोलन की कमान अपने हाथ में ले ली थी..आजादी के बाद गुजरात में छात्र आंदोलन (1973-74) और जयप्रकाश नारायण (JP) आंदोलन में छात्रों की भूमिका प्जीरमुख थी। जे.पी.आंदोलन से पहले गुजरात का छात्र आंदोलन (नवनिर्माण आंदोलन) 1974 के J P आंदोलन का प्रत्यक्ष प्रेरणा स्रोत बना।

दिसंबर 1973 में मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने हॉस्टल मेस फीस में 20% बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया। 20 दिसंबर 1973 को अहमदाबाद के एल.डी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में छात्र हड़ताल पर चले गए। 3 जनवरी 1974 को गुजरात यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन पुलिस से टकराया — लाठीचार्ज, आंसू गैस और 326 छात्रों की गिरफ्तारी हुई।

उत्तराखंड में 1970-1972में यूनिवर्सिटी का आंदोलन फिर19 77 -78 में वन आंदोलनको छात्रों ने ही दिशा दी..,1994 से 2000 के मध्य राज्य गठन के पक्ष में जो आंदोलन हुआउसमें भी छात्रों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी थी।

20 जुलाई को छात्रों द्वाराजो संसद घेराव की कॉल दी गई जिसमेंपुलिस द्वाराजिस प्रकार अमानवीय बल प्रयोग किया ,उससे देश में छात्रों के प्रति संवेदना का तूफान चरम पर है,यदि समय रहते केंद्र सरकार इसमें मानवीय हस्तक्षेप नहीं करती हैतो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं सरकार को खुले मन से समय से पहले वार्ता कर इस आंदोलन का सकारात्मक समाधान करना चाहिए।

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