सरकारी जमीन से रोजगार और राजस्व की नई इबारत लिख सकता है उत्तराखंड

सरकारी जमीन से रोजगार और राजस्व की नई इबारत लिख सकता है उत्तराखंड
देहरादून।
उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है—सीमित भू-संसाधनों का ऐसा इस्तेमाल, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले और पहाड़ों से पलायन की रफ्तार कम हो। ऐसे में यदि सरकार सरकारी जमीन को हॉस्पिटैलिटी और एजुकेशन सेक्टर के लिए निजी निवेशकों को दीर्घकालीन लीज पर देने की तैयारी कर रही है, तो यह महज जमीन के हस्तांतरण की कवायद नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक दिशा बदलने वाला कदम बन सकता है।
सरकार को एकमुश्त नहीं, लंबे समय तक मिलेगा राजस्व
सरकारी जमीन को निजी क्षेत्र को देने का सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि सरकार को लीज प्रीमियम, वार्षिक लीज रेंट, स्टांप ड्यूटी, जीएसटी/करों और अन्य शुल्कों के रूप में लगातार राजस्व प्राप्त हो। जमीन बेचने की बजाय लीज मॉडल अपनाया जाता है तो सरकार जमीन का स्वामित्व भी अपने पास रख सकती है और उससे दीर्घकालीन आय भी हासिल कर सकती है।
हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में बड़े होटल, रिसॉर्ट, कन्वेंशन सेंटर, वेलनेस सेंटर और पर्यटन सुविधाएं विकसित होने पर पर्यटकों की संख्या और उनका औसत खर्च बढ़ सकता है। इसका असर केवल सरकारी खजाने पर नहीं, बल्कि टैक्सी, होमस्टे, रेस्तरां, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों की बिक्री पर भी पड़ेगा।
असली फायदा स्थानीय युवाओं को रोजगार से
उत्तराखंड के लिए इस नीति की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना यह होना चाहिए कि इससे कितने स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है।
एक बड़े होटल को केवल रिसेप्शनिस्ट और वेटर ही नहीं चाहिए होते। उसके साथ ड्राइवर, शेफ, हाउसकीपिंग स्टाफ, सुरक्षा कर्मचारी, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, गाइड, ट्रैवल ऑपरेटर, अकाउंटेंट और मैनेजमेंट से जुड़े अनेक लोगों की आवश्यकता होती है।
इसी तरह नए स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, कौशल संस्थान और प्रशिक्षण केंद्र खुलने से शिक्षकों, प्रशासनिक कर्मचारियों, तकनीकी विशेषज्ञों और सपोर्ट स्टाफ के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
यदि सरकार लीज की शर्तों में यह प्रावधान करे कि परियोजना में एक निश्चित प्रतिशत रोजगार उत्तराखंड के स्थायी निवासियों को दिया जाएगा, तो इस नीति का सीधा लाभ स्थानीय परिवारों तक पहुंच सकता है।
पलायन रोकने में भी हो सकती है भूमिका
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा सवाल रोजगार के लिए युवाओं का राज्य से बाहर जाना है। यदि पहाड़ों और छोटे शहरों में गुणवत्तापूर्ण होटल, पर्यटन संस्थान, विश्वविद्यालय, स्किल सेंटर और अन्य सेवाएं विकसित होती हैं, तो युवाओं को अपने घर के आसपास ही रोजगार मिल सकता है।
खासकर अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, नैनीताल और रुद्रप्रयाग जैसे जिलों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप परियोजनाएं विकसित की जाएं तो पर्यटन और शिक्षा को रोजगार के बड़े केंद्रों में बदला जा सकता है।
शिक्षा में निवेश से बनेगा मानव संसाधन
एजुकेशन सेक्टर में निजी निवेश का लाभ केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा। अच्छे निजी विश्वविद्यालय, मेडिकल एवं पैरामेडिकल संस्थान, मैनेजमेंट कॉलेज, होटल मैनेजमेंट संस्थान, आईटी और कौशल विकास केंद्र खुलने से उत्तराखंड के युवाओं को अपने राज्य में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण मिल सकता है।
इससे बाहर पढ़ने जाने वाले छात्रों पर परिवारों का खर्च भी कम हो सकता है और राज्य खुद शिक्षा के केंद्र के रूप में उभर सकता है।
लेकिन जमीन देने की नीति में कुछ मजबूत शर्तें जरूरी
सरकारी जमीन निजी क्षेत्र को देने का फैसला तभी सफल माना जाएगा जब इसमें पारदर्शिता और सार्वजनिक हित सर्वोच्च प्राथमिकता हों। जमीन का आवंटन केवल बड़े निवेशकों को करने के बजाय परियोजना की गुणवत्ता, रोजगार सृजन और स्थानीय आर्थिक प्रभाव को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
सरकार को लीज एग्रीमेंट में स्पष्ट रूप से तय करना चाहिए—
परियोजना कब तक शुरू करनी होगी।
कितने स्थानीय लोगों को रोजगार देना अनिवार्य होगा।
स्थानीय युवाओं के लिए कितनी ट्रेनिंग और अप्रेंटिसशिप होगी।
जमीन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए ही होगा।
परियोजना पूरी न होने पर जमीन वापस लेने की व्यवस्था होगी।
पर्यावरणीय नियमों और स्थानीय भवन मानकों का कड़ाई से पालन होगा।
जमीन की कीमत और लीज शर्तों में पारदर्शिता रहेगी।
जमीन नहीं, उत्तराखंड के भविष्य में निवेश
उत्तराखंड के पास जमीन सीमित है, लेकिन पर्यटन और शिक्षा की संभावनाएं बहुत बड़ी हैं। इसलिए सरकारी जमीन को निजी क्षेत्र के लिए उपलब्ध कराने की नीति को ‘जमीन देने’ के बजाय ‘निवेश आकर्षित करने’ की नीति के रूप में देखा जाना चाहिए।
सरकार यदि जमीन का स्वामित्व अपने पास रखते हुए निजी निवेश, स्थानीय रोजगार, राजस्व और क्षेत्रीय विकास को एक साथ जोड़ने में सफल होती है, तो यह मॉडल उत्तराखंड के लिए नई आर्थिक ताकत बन सकता है।
सरकारी जमीन से सरकार को राजस्व मिले, निजी क्षेत्र को कारोबार मिले और स्थानीय युवाओं को रोजगार—यही इस नीति की असली कसौटी होनी चाहिए।
क्योंकि उत्तराखंड में जमीन की कीमत केवल उसकी बाजार कीमत नहीं है; उसकी असली कीमत इस बात में है कि उससे राज्य के कितने युवाओं का भविष्य बनता है।