2027 की बिसात: बाजपुर में ‘सिख कार्ड’ से भाजपा का मास्टरस्ट्रोक

2027 की बिसात: बाजपुर में ‘सिख कार्ड’ से भाजपा का मास्टरस्ट्रोक
वरिष्ठ पत्रकार अमित सैनी की त्वरित टिप्पणी
उत्तराखंड की राजनीति के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पड़ाव ‘बाजपुर विधानसभा’ में धामी सरकार के एक ताजा फैसले ने सियासी हलचल तेज कर दी है। युवा भाजपा नेता सुरेन्द्र सिंह नामधारी को उत्तराखंड राज्य किसान आयोग का उपाध्यक्ष मनोनीत करना महज एक नियुक्ति नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा की एक सुनियोजित घेराबंदी मानी जा रही है।
पिछले वर्ष मनजीत सिंह राजू को गन्ना विकास सलाहकार समिति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के ठीक एक साल बाद सुरेन्द्र सिंह नामधारी को मिली यह कमान भाजपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बाजपुर के 20 गांवों के भूमि मालिकाना हक को लेकर किसानों में पनप रहे आक्रोश को शांत करने और ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए भाजपा ने सिख नेतृत्व पर फिर से बड़ा भरोसा जताया है।
सियासी गलियारों में सबसे चौंकाने वाली चर्चा भाजपा के ‘थिंक टैंक’ की नई योजना को लेकर है। सूत्रों की मानें तो भाजपा के रणनीतिकार इस बार बाजपुर की सुरक्षित (रिजर्व) सीट पर किसी प्रभावशाली सिख पृष्ठभूमि वाले चेहरे को आगे कर बड़ा दांव खेलने की तैयारी में हैं। चर्चा है कि भाजपा इस बार पुराने ढर्रे को छोड़कर एक ऐसे चेहरे को जमीन पर उतारने पर विचार कर रही है, जो अनुसूचित जाति वर्ग के साथ-साथ सिख, पंजाबी तथा पहाड़ी मतदाताओं में गहरी पैठ रखता हो।
सुरेन्द्र नामधारी और मनजीत सिंह राजू जैसे युवा चेहरों को लगातार मिल रही तवज्जो को इसी राजनीतिक पूंजी को भविष्य में भुनाने की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा को पता है कि 2022 में कांग्रेस की जीत का अंतर मात्र 1,611 वोटों का था, ऐसे में 1% वोटों का ध्रुवीकरण भी परिणाम बदल सकता है।
बाजपुर विधानसभा में जीत का गणित हमेशा से सिख और पंजाबी मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, जिनकी संख्या क्षेत्र में लगभग 35 से 40 हजार के करीब है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने भी सिख बिरादरी को साधे रखने के लिए नगर पालिका और ब्लॉक स्तर पर सिख नेतृत्व को तवज्जो दी है, लेकिन भाजपा की हालिया नियुक्तियों ने कांग्रेस खेमे में बेचैनी बढ़ा दी है। सिख मतदाताओं में पैठ बनाने की यह होड़ बता रही है कि आगामी चुनाव मुद्दों से ज्यादा ‘चेहरों और समीकरणों’ पर लड़ा जाएगा। अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा का यह ‘सिख कार्ड’ 20 गांवों के भूमि प्रकरण की नाराजगी को धो पाएगा और क्या पार्टी का थिंक टैंक वाकई किसी बड़े उलटफेर की ओर कदम बढ़ाएगा ?
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