उत्तराखंड

भुवनेश्वर स्थित CIFA में उत्तराखंड के पत्रकारों का अध्ययन दौरा: “ब्लू इकोनॉमी” की दिशा में बड़ा कदम

भुवनेश्वर स्थित CIFA में उत्तराखंड के पत्रकारों का अध्ययन दौरा: “ब्लू इकोनॉमी” की दिशा में बड़ा कदम

CIFA से शीशपाल गुसाईं , स्वतंत्र पत्रकार और लेखक की रिपोर्ट

भुवनेश्वर (ओडिशा) स्थित ICAR–Central Institute of Freshwater Aquaculture (CIFA) में उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकारों के अध्ययन दल का दौरा ज्ञानवर्धक और अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

यह अध्ययन दौरा भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत Press Information Bureau (PIB) देहरादून द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें 13 वरिष्ठ पत्रकारों ने भाग लिया। दल का नेतृत्व असिस्टेंट डायरेक्टर संजीव सुन्द्रियाल ने किया, जबकि PIB ओडिशा के असिस्टेंट डायरेक्टर मर्मेंद्र कुमार जेना भी उपस्थित रहे।

भुवनेश्वर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित CIFA परिसर में पत्रकारों ने आधुनिक मत्स्य पालन पद्धतियों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। वैज्ञानिकों ने बताया कि किस प्रकार नियंत्रित वातावरण में गर्म पानी के माध्यम से अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता की मछलियों का पालन किया जा रहा है। यह मॉडल ओडिशा को देश के अग्रणी मत्स्य उत्पादक राज्यों में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

संस्थान के निदेशक Dr. Pramoda Kumar Sahoo ने बताया कि CIFA देश में ताजे पानी की मत्स्य पालन तकनीकों के विकास का प्रमुख केंद्र है। उन्होंने कहा कि संस्थान द्वारा विकसित तकनीकें कम लागत में अधिक उत्पादन देने में सक्षम हैं और इन्हें देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है।

इस दौरान एक्वाकल्चर प्रोडक्शन एंड एनवायरमेंट के वैज्ञानिक Dr. Pratap Chandra Das ने पत्रकारों को विशेष रूप से “चीतल मछली” के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह मछली अत्यंत स्वादिष्ट होती है और स्थानीय बाजार में इसकी कीमत लगभग ₹1600 प्रति किलोग्राम तक पहुंचती है।

चीतल मछली आमतौर पर 4 से 5 किलोग्राम तक की होती है और इसमें कांटे अधिक होते हैं, फिर भी ओडिशा के लोग इसे बड़े चाव से खाते हैं। यह उच्च मूल्य वाली मछली राज्य के मत्स्य व्यवसाय को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

फिश न्यूट्रीशन से जुड़े पहलुओं पर Shiv Shankar Giri ने जानकारी दी कि संतुलित आहार और वैज्ञानिक प्रबंधन से मछलियों की गुणवत्ता, स्वाद और उत्पादन तीनों को बेहतर बनाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि CIFA द्वारा विकसित न्यूट्रीशन मॉडल किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहे हैं।

अध्ययन के दौरान पत्रकारों ने “ब्लू इकोनॉमी” और भारत की वैश्विक मत्स्य उत्पादन क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए। वैज्ञानिकों ने बताया कि यदि आधुनिक तकनीकों और प्रशिक्षण को व्यापक स्तर पर लागू किया जाए, तो भारत वैश्विक स्तर पर मछली उत्पादन और निर्यात में अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है।

इस अध्ययन दौरे का एक महत्वपूर्ण पहलू उत्तराखंड और ओडिशा के मत्स्य पालन मॉडल का तुलनात्मक अध्ययन भी रहा। जहां ओडिशा में बड़े पैमाने पर गर्म पानी आधारित मत्स्य पालन किया जाता है और यह उत्पादन में अग्रणी है, वहीं उत्तराखंड में ठंडे पानी की उच्च मूल्य वाली मछलियों, विशेषकर ट्राउट, के माध्यम से गुणवत्ता आधारित मत्स्य पालन तेजी से विकसित हो रहा है।

अंततः यह अध्ययन दौरा पत्रकारों के लिए एक समृद्ध अनुभव साबित हुआ, जिसने न केवल उन्हें आधुनिक मत्स्य पालन तकनीकों से अवगत कराया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि भारत में “ब्लू इकोनॉमी” के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। CIFA जैसे संस्थान इस दिशा में देश को आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

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