उपभोक्ता आयोगों में 10 साल पुराने केस लंबित, शीघ्र न्याय के दावों पर सवाल

उत्तराखंड में उपभोक्ता आयोगों की शरण लेने वाले उपभोक्ता की संख्या में कमी
राज्य आयोग तथा जिला आयोगों में नहीं मिल रहा शीघ्र न्याय
3 से 5 माह में निपटाने का नियम, लंबित है 10 वर्ष से अधिक तक के पुराने केस
काशीपुर। नये उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में उपभोक्ताओं को शीघ्र न्याय दिलाने के प्रावधान होने के बावजूद उपभोक्ताओं को समय से शीघ्र न्याय नहीं मिल रहा हैं। इसका परिणाम यह हो रहा हैं कि उत्तराखंड में उपभोक्ता आयोगों की शरण लेने वाले उपभोक्ताओं की संख्या में कमी आ रही हैं। उपभोक्ता मामले के निपटारे के लिये 3 माह (प्रयोग शाला वाले मामले में 5 माह) का प्रावधान होने के बावजूद भी विभिन्न केस दस वर्षों से अधिक से उपभोक्ता आयोगों में फैसले के इंतजार में हैं।
काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग से राज्य व जिला आयोगों में केसों के निपटारें व लंबित होने सम्बन्धी विवरणों की सूचना चाही थी। इसके उत्तर में राज्य आयोग की लोक सूचना अधिकारी/प्रशासनिक अधिकारी वंदना शर्मा ने अपने पत्रांक 724 से सम्बन्धित विवरणों की सत्यापित फोटो प्रतिया उपलब्ध करायी थी।
नदीम को उपलब्ध सूचना के अनुसार अप्रैल 2016 के प्रारम्भ में राज्य उपभोक्ता परिवाद था 701 प्रथम अपील लंबित थी जबकि राज्य के 13 उपभोक्ता आयोगों में 3127 परिवाद केस लंबित थे।
लम्बित रहने की अवधि के अनुसार राज्य आयोग में लम्बित प्रथम अपील केसों में से 27 केस दस वर्ष से अधिक पुराने हैं जबकि 125 केस दस वर्ष, 148 केस सात वर्ष, 201 केस 5 वर्ष, 36 केस तीन वर्ष, 32 केस दो वर्ष तथा 68 केस छः माह से एक वर्ष तथा 65 केस छः माह से कम पुराने लंबित हैं। राज्य आयोग में मूल परिवाद केसों में 9 केस दस वर्ष से अधिक, 22 केस दस वर्ष, 5 केस 7 वर्ष, 3 केस 3 वर्ष, 1 केस 2 वर्ष, 3 केस छः माह से एक वर्ष तथा केवल 3 केस छः माह से फैसले के इंतजार में है।
उत्तराखंड के 13 जिलों में लंबित कुल उपभोक्ता केसों में से 26 केस दस वर्ष से अधिक, 62 केस दस वर्ष, 217 केस सात वर्ष, 647 केस पांच वर्ष, 718 केस तीन वर्ष, 675 केस दो वर्ष, 409 केस छः माह से एक वर्ष तथा 362 केस छः माह से कम समय से फैसले के इंतजार में है।
उत्तराखंड में जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ उपभोक्ता में तो वृद्धि हो रही हैं लेकिन उपभोक्ता आयोगों की शरण लेने वाले उपभोक्ताओं में कमी आ रही है। इसका सबसे प्रमुख कारण शीघ्र न्याय का प्रावधान उपभोक्ता कानून में होने के बावजूद भी अधिकतर उपभोक्ताओें को शीघ्र न्याय व राहत न प्राप्त होना हैं। यदि वर्ष वार उत्तराखंड में उपभोक्ता आयोगों (पहले राज्य आयोग व जिला फोरम) की शरण लेने वालों के आंकड़े देखे तो इसके रूझान उसी ओर संकेत करते हैं।
वर्ष 2016 में जहां राज्य आयोग में 292 उपभोक्ता केस फाइल हुये वहीं जिला फोरम/ आयोग में 1462, वर्ष 2017 में यह संख्या कम होकर 198 तथा 1086 हो गयी, वर्ष 2018 में 292 तथा 1185, वर्ष 2019 में 468 तथा 1365, वर्ष 2020 में 170 तथा 1529, वर्ष 2021 में 205 तथा 1434, वर्ष 2022 में 322 तथा 1859, वर्ष 2023 में इसमें भारी गिरावट होकर संख्या 3 अंकों में ही रह गयी।
वर्ष 2023 में राज्य आयोग में कुल 116 केस फाइल हुये जबकि जिला आयोगों में 970 केस ही फाइल हुये, वर्ष 2024 में सर्वाधिक घटकर यह संख्या मात्र 29 तथा 574 ही रह गयी। वर्ष 2025 में 134 तथा 776 केस ही फाइल हुये जबकि वर्ष 2026 के प्रारंभिक 4 माह (अप्रैल 2026 तक) राज्य आयोग में 58 तथा जिला आयोगों में केवल 311 केस ही फाइल हो सके।
यदि व्यापार क्षेत्रवार उपभोक्ताओं द्वारा राज्य आयोग की शरण लेने को देखें तो गठन से 31 मार्च 202 6 तक सर्वाधिक मामले बीमा से सम्बन्धित फाइल हुये है इसमें 130 परिवाद तथा 2261 अपील शामिल हैं जबकि दूसरे स्थान पर बैंक से सम्बन्धित 27 परिवाद तथा 566 अपील फाइल हुई हैं। तीसरे स्थान पर विद्युत से सम्बन्धित 8 परिवाद तथा 391 प्रथम अपील फाइल हुये है। इसके अतिरिक्त डाक से सम्बन्धित 1 परिवाद 151 अपीले, सरकारी हाउसिंग से सम्बन्धित 2 परिवाद 80 अपीले, प्राइवेट सोसाइटीज/बिल्डर्स से सम्बन्धित 67 परिवाद, 186 अपीलें, मेडिकल लापरवाही से सम्बन्धित 41 परिवाद 207 अपीलें, खराब घरेलू सामान सम्बन्धी 1 परिवाद 201 अपीलें, शिक्षा सम्बन्धी 13 परिवाद, 189 अपीलें, अन्य क्षेत्रों से सम्बन्धित 31 परिवाद 1337 अपीलें फाइल हुई हैं। इसके अतिरिक्त रेलवे से सम्बन्धित 31, एयरलाइंस से सम्बन्धित 17, टेलीकाम 141 तथा रोड ट्रांसपोर्ट से सम्बन्धित 23 प्रथम अपीलें राज्य आयोग में 31 मार्च 2026 तक फाइल हुई है।