विकास के नाम पर प्रकृति से छेड़छाड़ की वजह से आ रही हैं प्राकृतिक आपदाएं: आचार्य प्रशांत

देहरादून। प्रख्यात दार्शनिक, विचारक , लेखक आचार्य प्रशांत ने उत्तराखंड में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि आत्मज्ञान के अभाव में विकास को गलत तरीके से परिभाषित किया जा रहा है जिसकी वजह से उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाएं गंभीर चिंता का विषय बन रही हैं। अगर अब भी नहीं चेते तो बर्बादी होना तय है।
उन्होंने पर्यटन के नाम पर प्रकृति का विनाश करने वाले लोगों को नियंत्रित करने के लिए उन पर भारी भरकम टैक्स लगाने की बात कही जिससे पहाड़ को बचाया जा सके।
हिमालयन कल्चरल सेंटर में आयोजित संवाद सत्र में सैकड़ों की संख्या में मौजूद लोगों ने आचार्य प्रशांत के पहुंचने पर उनका जोरदार स्वागत किया ऑटोग्राफ लिए और कई संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई।
आचार्य प्रशांत ने भगवद्गीता से सत्र की शुरुआत की , कहा कि आज समाज की ज्यादातर समस्याओं की जड़ “अज्ञान” है। “आत्मज्ञान के बिना इंसान जो भी करेगा—चाहे रिश्ता बनाए या विकास—वह अंततः स्वार्थ, डर और लालच पर आधारित होगा,” ।
उत्तराखंड में बदलते मौसम और बढ़ती आपदाओं पर उन्होंने गंभीर चिंता जताई,कहा कि “अप्रैल में भारी बारिश होना सामान्य नहीं है। यह साफ संकेत है कि प्रकृति असंतुलित हो चुकी है,”
चमोली , केदारनाथ जैसी आपदाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये घटनाएं केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव की गलत नीतियों और लालच का परिणाम हैं। पहाड़ों में अंधाधुंध निर्माण, जंगलों की कटाई और नदियों के किनारे बढ़ते अतिक्रमण ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है।
उन्होंने बाहरी राज्यों से आने वाले पर्यटकों पर भी सवाल उठाया। “पिकनिक के नाम पर लोग पहाड़ों में कूड़ा फैला रहे हैं, प्रकृति का नुकसान कर रहे हैं। ऐसे लोगों पर भारी टैक्स लगाया जाना चाहिए, तभी नियंत्रण संभव होगा,” ।आचार्य प्रशांत ने चेताया कि “यह पीढ़ी तो किसी तरह निकल जाएगी, लेकिन इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे। सच यह है कि विनाश के लिए अब ज्यादा समय नहीं बचा है।”
आपसी रिश्तों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “प्रेम नहीं, सुविधा और शरीर का खेल” है। विवाह और प्रेम संबंधों पर पूछे गए सवालों पर उन्होंने बेहद स्पष्ट और कठोर टिप्पणी की। “बिना समझ के जो भी रिश्ता बनेगा, वह स्वार्थ और लालच का ही होगा,” ।
पति-पत्नी के संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज ज्यादातर विवाह प्रेम पर नहीं, बल्कि शारीरिक आकर्षण और सामाजिक व्यवस्था पर टिके हैं। “अगर किसी को पहले ही बता दिया जाए कि शादी होगी लेकिन शारीरिक संबंध नहीं बनेंगे, तो क्या वह रिश्ता बनेगा? ज्यादातर मामलों में जवाब ‘नहीं’ होगा,”
उन्होंने यह भी कहा कि कानून भी इस वास्तविकता को स्वीकार करता है, जहां वैवाहिक जीवन में शारीरिक संबंध न होना तलाक का आधार बन सकता है। “फिर प्रेम कहां है? सच्चाई यह है कि हम प्रेम नहीं, बल्कि देह और सुविधा के आधार पर रिश्ते बना रहे हैं,” ।
महिलाओं की भूमिका पर उन्होंने कहा कि समाज ने लंबे समय तक उन्हें उपभोग की वस्तु बनाकर रखा है। “अक्सर व्यवस्था ऐसी होती है कि पति कमाता है और पत्नी घर में रहकर उसकी अपेक्षाएं पूरी करती है। यह बराबरी का रिश्ता नहीं है,” उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की सलाह देते हुए कहा कि “जब तक महिला आर्थिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होगी, तब तक वह वास्तविक सम्मान नहीं पा सकती।”
युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा, “नशा असल में जिम्मेदारी से भागने का तरीका है। जब इंसान अपनी समस्याओं का सामना नहीं करता, तो वह नशे में शरण लेता है।”कैरियर और तनाव पर उन्होंने कहा कि आज का युवा बिना समझ के भीड़ का पीछा कर रहा है। “आपका नियंत्रण केवल आपके प्रयास और नीयत पर है, परिणाम पर नहीं,” उन्होंने भगवद्गीता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा।
उन्होंने समय की बर्बादी पर भी कटाक्ष करते हुए कहा कि “आज का युवा सबसे ज्यादा समय बिना उद्देश्य के खर्च कर रहा है। जिस चीज को आप महत्व देते हैं, वही आपकी जिंदगी बन जाती है।”
आचार्य प्रशांत ने अपने संबोधन में साफ कहा कि चाहे पर्यावरण संकट हो, रिश्तों की उलझन हो या व्यक्तिगत तनाव—इन सभी की जड़ एक ही है: आत्मज्ञान की कमी।
“जब तक व्यक्ति खुद को नहीं समझेगा, तब तक वह हर स्तर पर गलत फैसले लेगा चाहे वह विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन हो या रिश्तों में स्वार्थ,”।