उत्तराखंड

सैन्य धाम के लोकार्पण में पांच साल की देरी पर मंत्री का बयान भाजपा की राजनीतिक सोच का बेहद शर्मनाक चेहरा: कांग्रेस

शहादत को चुनावी लाभ से तौलने वाले गणेश जोशी को शहीदों की कुर्बानी का अर्थ ही नहीं पता: गणेश गोदियाल

सैन्य धाम के लोकार्पण में पांच साल की देरी पर मंत्री का बयान भाजपा की राजनीतिक सोच का बेहद शर्मनाक चेहरा: कांग्रेस

देहरादून। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सैन्य धाम के निर्माण और उसके लोकार्पण को लेकर कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि शहीदों की कुर्बानी को चुनावी लाभ के तराजू पर तौलना भाजपा की बेहद संकीर्ण और संवेदनहीन मानसिकता का परिचायक है।

गोदियाल ने कहा कि गणेश जोशी का यह कहना कि “हम राजनीतिक दल हैं, इसका चुनावी लाभ लेंगे, हम साधु-संत नहीं हैं” केवल एक बयान नहीं, बल्कि शहीदों और उनके परिवारों के प्रति भाजपा सरकार की सोच का पर्दाफाश है। शहीदों के नाम पर बने स्मारक को पांच वर्षों तक लटकाए रखना और फिर चुनाव नजदीक आते ही उसके राजनीतिक लाभ की बात करना उन परिवारों का अपमान है, जिन्होंने देश के लिए अपने बेटे, पति, पिता और भाई खोए हैं।

प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि गणेश जोशी को शहादत और सत्ता की राजनीति के बीच का फर्क समझना चाहिए। सैन्य धाम किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। यह उत्तराखंड की सैन्य परंपरा, वीर जवानों की शहादत और उनके परिवारों की भावनाओं का प्रतीक है। यदि शहीदों के घरों की मिट्टी लाकर इस धाम का निर्माण किया गया है, तो उस पवित्र मिट्टी को चुनावी फायदे के चश्मे से देखना और भी दुर्भाग्यपूर्ण है।

गोदियाल ने सवाल किया कि क्या गणेश जोशी किसी शहीद की विधवा के सामने खड़े होकर यह कह सकते हैं कि सैन्य धाम का लोकार्पण इसलिए रोका गया क्योंकि भाजपा को चुनाव में इसका लाभ लेना था? क्या वह उन मासूम बच्चों की आंखों में आंख डालकर यह बात कह पाएंगे, जिनके सिर से उनके पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया? क्या वह उन बूढ़े मां-बाप से यह कह सकते हैं, जिनकी बुढ़ापे की लाठी देश के लिए शहीद हो गई? क्या वह उस बहन से यह कह सकते हैं, जिसकी कलाई आज भी अपने भाई की राखी का इंतजार करती है?

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड केवल देवभूमि नहीं, बल्कि वीरभूमि और सैन्य भूमि भी है। यहां शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसका सेना से किसी न किसी रूप में संबंध न हो। ऐसे प्रदेश में शहादत को चुनावी लाभ से जोड़ना उत्तराखंड की सैन्य परंपरा और सैनिक परिवारों की भावनाओं का सीधा अपमान है।

गोदियाल ने सैन्य धाम की लागत को लेकर भी सरकार पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जिस परियोजना की लागत के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, उसकी लागत में भारी वृद्धि की चर्चाएं सामने आई हैं। जिस परियोजना की निगरानी सरकार के हाथ में हो और उसी परियोजना में लागत लगातार बढ़ती जाए, वहां पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि धामी सरकार में जिस मंत्री के विभाग से जुड़े मामलों पर पहले से गंभीर सवाल और जांचें चल रही हों, उसी मंत्री के अधीन सैन्य धाम जैसी संवेदनशील परियोजना का होना सरकार की प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि उद्यान विभाग से जुड़े कथित घोटाले की जांच, मंत्री से जुड़े संपत्ति संबंधी आरोप और सैन्य धाम की बढ़ती लागत—इन तमाम सवालों का जवाब सरकार को जनता के सामने देना होगा। जांच एजेंसियां यदि किसी मामले की जांच कर रही हैं तो उसका अंतिम निष्कर्ष आने से पहले किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन सरकार इन सवालों से भाग नहीं सकती।

गोदियाल ने कहा कि भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सैन्य धाम शहीदों की श्रद्धांजलि का स्थल है या भाजपा के चुनावी प्रचार का मंच? यदि यह शहीदों को श्रद्धांजलि है तो इसके लोकार्पण का समय चुनावी गणित से क्यों जोड़ा जा रहा है?

उन्होंने कहा कि शहीदों की शहादत किसी पार्टी का चुनावी पोस्टर नहीं है। सैनिकों ने देश की सीमाओं पर अपनी जान इसलिए नहीं दी कि उनकी कुर्बानी को पांच साल तक सरकारी फाइलों में रोका जाए और चुनाव आने पर उसका राजनीतिक लाभ उठाया जाए।

गोदियाल ने कहा कि भाजपा नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि उत्तराखंड की जनता सैनिकों के सम्मान और उनकी शहादत के साथ राजनीति बर्दाश्त नहीं करेगी। सैन्य धाम का लोकार्पण कब और क्यों टाला गया, इसकी पूरी समय-रेखा, परियोजना की वास्तविक लागत, अब तक हुआ खर्च और लागत बढ़ने के कारणों का सरकार को सार्वजनिक रूप से श्वेतपत्र जारी करना चाहिए।

अंत में प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि गणेश जोशी का बयान भाजपा के उस चेहरे को सामने लाता है, जहां शहादत भी वोट बैंक और चुनावी लाभ की गणित में बदल दी जाती है। उत्तराखंड के वीर सैनिकों और शहीद परिवारों का सम्मान किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि इस देवभूमि की आत्मा है।

 

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