मुक्त बाजार को कठोर सरकार-तानाशाही की दरकार

मुक्त बाजार को कठोर सरकार-तानाशाही की दरकार
वर्तमान भारतीय परिदृश्य और हमारे कार्यभार विषय पर प्रो. रविभूषण का व्याख्यान
इतिहास बोध विचार मंच की ओर से चतुर्थ प्रो. लाल बहादुर वर्मा स्मृति व्याख्यान
देहरादून। वर्तमान भारतीय परिदृश्य और हमारे कार्यभार विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. रविभूषण ने कहा कि कॉरपोरेट की मुक्त बाजार व्यवस्था को खुद को टिकाने के लिए कठोर सरकार और तानाशाही की जरूरत होती है और आज हम यही देख रहे हैं।
यह व्यवस्था समाज की सामूहिकता को खत्म करती है इसलिए स्त्री विमर्श, दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श को अलग- अलग नहीं एक साथ चलना होगा। इस व्यवस्था में तब्दीली के लिए सबसे पहले हमें सच का साथ देना होगा। समाज में परस्पर संवाद को बढ़ाना होगा।

रविवार को देहरादून के उत्तरांचल प्रेस क्लब सभागार में इतिहास बोध विचार मंच की ओर से आयोजित चतुर्थ प्रो. लाल बहादुर वर्मा स्मृति व्याख्यान में प्रो. रविभूषण ने मार्शल प्लान, विश्व बैंक, मुद्रा कोष, बॉम्बे प्लान, अमेरिकी आर्थिक विचारकों के मॉडलों, शिकागो स्कूल, डंकल प्रस्ताव आदि पर टिप्पणी करते हुए विस्तार से बताया कि आज देश के जो हालात बने हैं उसके बीज आजादी के 20-30 साल बाद ही पड़ गए थे। 21वीं सदी जनता की नहीं कॉरपोरेट की सदी है, आवारा पूंजी का युग है। न्यू इंडिया कुछ नहीं बल्कि अमेरिकी वर्चस्व वाला डिजिटल इंडिया है।
आज हम जिस सांप्रदायिक फासीवाद को हम देख रहे हैं वह नव उदारवादी व्यवस्था का उत्पाद है। सांप्रदायिकता, मुक्त बाजार और राजनीति में गहरा अंतरसंबंध है। लोकतंत्र के गर्भ से ही फासीवाद जन्म ले रहा है। आप ही देखें 90 के दशक से पहले देश में कितने अरबपति थे और कितने किसान खुदकुशी करते थे और आज क्या हाल है।
नोटबंदी, वोटबंदी और मुंहबंदी, इस सबने देश को भयानक संकट में फंसा दिया है। इसीलिए इसे चुनावी तानाशाही कहा जा रहा है। क्योंकि अब कॉरपोरेट को जरूरत नहीं इसीलिए कल्याणकारी राज्य के जमाने में बनीं सारी संवैधानिक संस्थाएं ढहाई जा रही रही है।
इसके पहले कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि व पत्रकार इब्बार रब्बी ने तंज के लहजे में कहा कि हमारी उपलब्धि है कि हमने अपने हिटलर मुसोलिनी पैदा कर दिए हैं हमें उन्हें विदेशों से आयात नहीं करना पड़ा। इतिहासबोझ मंच की व प्रो. लाल बहादुर वर्मा की पुत्री आशु वर्मा ने प्रो. वर्मा के कृतित्व व जीवन पर प्रकाश डाला । कार्यक्रम का संचालन दिगंबर व कैलाश नौडियाल ने किया।
इस मौके पर डॉ. जितेंद्र भारती, राजेश सकलानी, नवीन कुमार नैथानी, दिनेश जोशी, उषा नौडियाल, संजीव घिल्डियाल, समदर्शी बड़थ्वाल, संजय जोशी, मदन मोहन चमोली, आरएन झा आदि दर्जनों साहित्यकार, संस्कृति कर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।