महमारी के दौर में फील्ड से गायब हैं मंत्री और अधिकांश विधायक
राहत कोष में वेतन देने में भी विधायक कर रहे ना-नुकुर
अब दायित्वधारी भी नहीं ले रहे हैं अवाम की कोई सुध
जनप्रतिनिधि के नाम पर प्रधानों को डटाया है मैदान में
न्यूज वेट ब्यूरो
देहरादून। उत्तराखंड में कोरोना संकट लगातार बढ़ रहा है। इसके बाद भी जनता की सेवा का दावा करने वाले मंत्रीगण और अधिकांश विधायक फील्ड में नहीं दिख रहे हैं। तमाम विधायक तो महामारी से लड़ने के लिए वेतन-भत्तों में कटौती से ही भाग रहे हैं। जनता के खजाने से पैसा लेने वाले दायित्वधारी भी फील्ड से गायब है। इस समय जनप्रतिनिधि के नाम पर केवल ग्राम प्रधान ही मैदान में डटें हैं। जाहिर है कि अब इन जनसेवकों को आने वाले चुनाव में जनता के सवालों का सामना तो करना ही होगा।
कोरोना संकट के इस दौर में सूबे का कोई भी मंत्री फील्ड में सक्रिय नहीं दिख रहा है। हालात ये हैं कि इन मंत्रियों ने अपने प्रभार वाले जिले की सुध लेना तक गंवारा नहीं किया है। यही हाल अधिकांश विधायकों का भी है। ये जनसेवक भी अपनी जनता की सुध लेने मौके पर नहीं जा रहे हैं। अधिकांश विधायक तो अपने वेतन और भत्तों में कटौती की सहमति देने तक तो तैयार नहीं है। कांग्रेसी विधायकों ने इस कटौती के बारे में कैबिनेट के फैसले को मानने से ही इंकार कर दिया है। इतना ही नहीं सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक भी इस कटौती से भाग रहे हैं।
उत्तराखंड में सरकारी खजाने से पैसा लेने वाले भाजपा नेताओं के एक तबके तो दायित्वधारी कहा जाता है। इन्हें जनता से फिलहाल तो नहीं चुना है। लेकिन आने वाले चुनाव में इनमें से कई दावेदारी के लिए तैयार हैं। इसके बाद भी ये दायित्वधारी अवाम के बीच जाकर सुध लेने को तैयार नहीं है। इनके वेतन और भत्तों से कटौती का कोई प्रस्ताव को सरकार की ओर से नहीं है। लेकिन किसी ने भी स्वेच्छा से मुख्यमंत्री राहत कोष में पैसा देने की पहल नहीं की।
इस समय जनप्रतिनिधि के नाम पर केवल ग्राम प्रधान ही अवाम के बीच है। प्रशासन ने इन प्रधानों को क्वारंटीन सेंटरों का काम दिया है। ये प्रधान एक तरफ तो पैसों की तंगी झेल रहे हैं तो दूसरी तरफ कई बार इन्हें क्वारंटीन सेंटरों में रहने वालों के व्यंग्य वाणों को भी झेलना पड़ रहा है।
सवाल यह है कि इस महामारी के दौर में दूर भाग रहे नेताजी अगले चुनाव में वोट मांगते वक्त इसी अवाम को क्या जवाब देंगे। लोग कह रहे हैं कि अगर ये महामारी चुनाव के वक्त आती तो उन लोगों की इतनी दुर्दशा न होती।