पायर … .आमा-बूबू का प्रेम, चिता और सुलगते सवाल!

पायर … .आमा-बूबू का प्रेम, चिता और सुलगते सवाल!
विनोद कापड़ी की असाधारण रचनाधर्मिता से पहाड़ की देश-दुनिया में चर्चा
-आमा-बूबू के किरदारों की दर्शकों के जेहन में अमिट छाप
-पलायन, अकेलापन, रिश्तों की बुनियाद पर खड़ी है फिल्म
विपिन बनियाल
-पायर यानी चिता। चिता में प्रचंडता होती है। सब कुछ खाक कर देने का माद्दा होता है। सुलगते सवाल भी होते हैं। विनोद कापड़ी की पायर फिल्म सुलगते सवालों का ऐसा मंच बनी है, जिससे जुड़कर दर्शकों की आंखें नम होती हैं। मन उद्वेलित होता है और पहाड़ की पीड़ा को हम नए सिरे से महसूस करने लगते हैं। आप थियेटर से निकल तो आते हैं, लेकिन आपके जेहन से फिल्म नहीं निकलती। कमाल हैं विनोद कापड़ी! कमाल हैं, पहली बार कैमरा फेस कर एक्टिंग का बेहतरीन मुजाहिरा करने वाले आमा-बूबू यानी हीरा देवी और पदम सिंह कापड़ी।
पायर के साथ जुड़ा 18 अंतरराष्ट्रीय अवार्ड जीतने का तथ्य महत्वपूर्ण है। फिल्म की शानदार ब्रांडिंग भी हुई है। ये दोनों बातें आपकोे थियेटर तक खींच कर जरूर लाती है, लेकिन जब आप थियेटर से निकलते हैं, तो यह फिल्म सिर्फ अपनी खूबियों की वजह से आपके दिमाग पर छायी रहती है।
पहाड़ के जीवन की सच्चाई क्या है। मोटे-मोटे तौर पर कहें, तो कठिन परिस्थितियां, सुविधाओं का अभाव, पलायन, संघर्ष, तकलीफ, अपनों का इंतजार, अकेलापन, उदासी, बेचैनी, आशंका। बहुत सारी बातें हैं। सकारात्मक बातें भी हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी आस, कठिन जीवन के बीच भी जिंदादिली, खुशी की तलाश और रिश्तों में बेइंतहा प्यार। विनोद कापड़ी ने पायर फिल्म में पहाड़ की इन सच्चाईयों के हर अच्छे-बुरे रंग भरे हैं। फिल्म की बुनावट इतने करीने से की गई है, कि दो घंटे से भी कम अवधि वाली इस फिल्म में पिन ड्राप साइलेंस रहता है। यह सन्नाटा तब ही टूटता है, जब आमा-बूबू की मीठी-तीखी नोक-झोंक होती है।
फिल्म में प्रकृति अपने दोनों रूप में मौजूद है। सम्मोहन से बांध लेने वाला प्राकृतिक सौंदर्य है, तो मूसलाधार बारिश के रूप में प्रकृति का वो रौद्र रूप भी है, जिससे दर्शक सहमे से रहते हैं। घनघोर बारिश, जैसे सब कुछ बहा ले जाएगी। फिर अगले दिन उतनी ही खूबसूरत सुबह, उतना ही खूबसूरत पूरा दिन। पहाड़ का जीवन ऐसा ही है।
डोली में बैठाकर आमा को अस्पताल ले जाना हो या फिर डाॅक्टर से लेकर युवाओं और पोस्टमैन तक को उपकृत करने के लिए बकरी देने के सीन में लाचारगी के दारूण दर्शन है। आमा की सेहत के वास्ते ये बेचारगी ज्यादातर बूबू के हिस्से ही आई हैं। बेचारगी इस कदर कि अपनी नई नौकरी पर जाने के लिए उत्साहित गांव के युवक से रूक जाने का अनुरोध करना पड़ता है। युवक चला जाएगा, तो फिर कैसे आमा को अस्पताल लाया-ले जाया जा सकेगा। ऐसे ही कई सारे सवाल बूबू के दिमाग में मथते रहते हैं।
प्रदेश गए बेटे का कभी ना खत्म होने वाला इंतजार और उसके पीछे की सच्चाई स्तब्ध करती है। गांव के घरों पर एक के बाद एक लगते ताले और बुजुर्ग दंपत्ती की मनःस्थिति, विचलित कर देती है। इन सबके बीच, आमा-बूबू का एक दूसरे के लिए प्यार, देख-भाल, समर्पण पहाड़ की चोटी पर खिलते उन फूलों की तरह है, जिनकी उपस्थिति कठिन जगह पर है, लेकिन उसमें कमी कतई नहीं है। अपनी बनाई चिता में बैठना दारुण दुख की अनुभूति कराता है।
विनोद कापड़ी की सोच, उनके लेखन, उनके निर्देशन में से किसकी तारीफ सबसे ज्यादा की जाए, तय करना मुश्किल है। सब कुछ लाजवाब है। इसी तरह, पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी की स्वाभाविक दमदार एक्टिंग न हो, तो पायर फिल्म फिर पायर नहीं बन पाएगी। पहाड़ के लोकगीत जिस तरह से लोक जीवन में रचे-बसे हैं, उसी तरह, फिल्म में भी उनकी प्रभावशाली उपस्थिति है।
गुलजार जैसे दिग्गज गीतकार जब इस फिल्म से जुड़ते हैं, तो फिल्म का स्तर और बढ़ जाता है। प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका श्रुति सडोलिकर की आवाज में क्लाइमेक्स में गुलजार का लिखा गीत बजता है, तो फिल्म का प्रभाव और मजबूत होकर उभरता है। एकेडमी अवार्ड विजेता कैनेडियन कंपोजर माइकल डाना का संगीत भी उसी उच्च स्तर का है, जिस स्तर की यह फिल्म है। बैक ग्राउंड म्यूजिक की अपनी खासियत है। मानस भट्टाचार्य का कैमरा वर्क फिल्म में पहाड़ की तरह ही प्राकृतिक है।
आस्कर अवार्ड से जोड़कर अब पायर फिल्म की बातें की जा रही हैं। बहरहाल, विनोद कापड़ी ने जिस तरह की रचनाधर्मिता दिखाई है, वह शानदार है। उनकी फिल्म देखकर दर्शक रो रहे हैं। दर्शक फिल्म पर अपना प्यार लुटा रहे हैं। इससे बड़ा और कोई पुरस्कार क्या हो सकता है।