
उत्तराखंड राज्य के 25 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य गठन के बाद से ही यहां की राजनीति ‘गढ़वाल बनाम कुमाऊं’ के इर्द-गिर्द सिमटी रही है, लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मिथक और धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। आज धामी की पहचान किसी एक मंडल के नेता के रूप में नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के निर्विवाद नेता के रूप में उभरी है।
राज्य के गठन के बाद नारायण दत्त तिवारी, हरीश रावत या विजय बहुगुणा जैसे दिग्गज नेताओं पर अक्सर यह आरोप लगता रहा कि उनका झुकाव अपने पैतृक मंडल की ओर अधिक है। पूर्ववर्ती सरकारों में विकास कार्यों और नियुक्तियों को लेकर भी अक्सर क्षेत्रीय असंतुलन की चर्चा होती थी। हालांकि, पुष्कर सिंह धामी ने अपनी कार्यशैली से उस पारंपरिक ठप्पे को मिटा दिया है।
कुमाऊं से ताल्लुक रखने के बावजूद धामी ने गढ़वाल मंडल के विकास और वहां की जनभावनाओं को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति: केदारनाथ और बद्रीनाथ पुनर्निर्माण कार्यों की व्यक्तिगत निगरानी ने उन्हें गढ़वाल की जनता के करीब पहुंचाया है।
कनेक्टिविटी: हेमकुंड साहिब रोपवे और सीमांत गढ़वाल के दुर्गम क्षेत्रों में सड़क जाल बिछाना उनकी प्राथमिकता रही है।
संकट में नेतृत्व: उत्तरकाशी की सिल्कयारा सुरंग में फंसे मजदूरों के सफल रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान उन्होंने जिस तरह मौके पर डटकर नेतृत्व किया, उसने उनकी छवि एक ‘संकटमोचक’ की बनाई।
कठोर निर्णय: अंकिता भंडारी जैसे संवेदनशील प्रकरण में CBI जांच और कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कर उन्होंने यह संदेश दिया कि न्याय के लिए क्षेत्र या राजनीति आड़े नहीं आएगी।
गढ़वाल-कुमाऊं की विभाजक रेखा हुई खत्म
विशेषज्ञों का मानना है कि धामी ने न तो अपने मूल क्षेत्र (कुमाऊं) की उपेक्षा की और न ही गढ़वाल को पराया समझा। शासन को क्षेत्रवाद की राजनीति से ऊपर उठाकर उन्होंने राज्य में एक नई कार्यसंस्कृति विकसित की है।
पुष्कर सिंह धामी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने उत्तराखंड की राजनीति में दशकों से चली आ रही गढ़वाल-कुमाऊं की विभाजक रेखा को धुंधला कर दिया है। यह राज्य की एकता और भविष्य के विकास के लिए एक शुभ संकेत माना जा रहा है।
मोहन बुलानी का आलेख