उत्तराखंड

काशीपुर की सियासत में बदलते समीकरण: विरोध से गलबहियों तक, 2027 की बिसात अभी से बिछने लगी, पढ़िए… एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

काशीपुर।

राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है, न कोई स्थायी शत्रु—यह कहावत काशीपुर की भाजपा राजनीति में इन दिनों पूरी मजबूती से जीवंत होती दिखाई दे रही है। कभी टिकट वितरण के दौरान एक-दूसरे के आमने–सामने खड़े नजर आने वाले भाजपा नेता राम मेहरोत्रा और दीपक बाली आज एक ही मंच पर, एक ही फ्रेम में मुस्कुराते और गलबहियां करते दिख रहे हैं। शिलान्यास कार्यक्रमों से लेकर बैठकों तक यह बदला हुआ दृश्य सियासी गलियारों में एक ही सवाल छोड़ जाता है— “क्या यह 2027 की राजनीति का ट्रेलर है?”

अगर काशीपुर की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो तस्वीर और भी दिलचस्प हो जाती है। राज्य गठन के बाद से अब तक हुए सभी विधानसभा चुनावों में काशीपुर सीट पर चीमा परिवार का दबदबा रहा है।

2002 से 2017 तक भाजपा के टिकट पर हरभजन सिंह चीमा की लगातार जीत, और फिर 2022 में बेटे त्रिलोक सिंह चीमा को उत्तराधिकारी बनाकर न सिर्फ टिकट दिलवाना बल्कि जीत सुनिश्चित करना—यह सब चीमा परिवार की मजबूत पकड़ को दर्शाता है। हालांकि, इस राजनीतिक यात्रा में असंतोष की चिंगारी भी बराबर सुलगती रही।

2022 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मेयर ऊषा चौधरी और राम मेहरोत्रा जैसे दावेदार टिकट से वंचित रह गए। विरोध खुलकर सामने आया, लेकिन इसके बावजूद भाजपा ने सीट बरकरार रखी।

फिर आया निकाय चुनाव।

इस बार भाजपा ने भरोसा जताया दीपक बाली पर। टिकट कटने से राम मेहरोत्रा की नाराजगी फिर सामने आई। लेकिन वक्त के साथ राजनीति ने करवट बदली—और आज वही चेहरे एक-दूसरे के साथ मंच साझा करते दिख रहे हैं।

अब जैसे-जैसे 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, काशीपुर की सियासत में फिर से हलचल तेज हो गई है। भाजपा के भीतर टिकट की दौड़ शुरू हो चुकी है। त्रिलोक सिंह चीमा को टिकट से दूर करने की चर्चाओं के बीच जिन नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है, उनमें शामिल हैं—

पूर्व मेयर ऊषा चौधरी, भाजपा नेता राम मेहरोत्रा, खिलेंद्र सिंह, और मौजूदा मेयर दीपक बाली।

सियासी सूत्रों की मानें तो मामला यहीं नहीं रुकता। भाजपा के कई नेता अंदरखाने दीपक बाली के साथ खड़े होते दिख रहे हैं। दलील साफ है—अगर वे खुद टिकट की दौड़ में आगे नहीं बढ़ पाए, तो विकल्प के तौर पर दीपक बाली को विधानसभा का चेहरा बनाने की रणनीति अपनाई जा सकती है। इससे भविष्य में मेयर की राजनीति के रास्ते भी खुले रहेंगे।

इस तर्क को बल देता है देहरादून का उदाहरण, जहां नगर निगम के मेयर रहते हुए विनोद चमोली ने धरमपुर विधानसभा से चुनाव लड़ा, जीत दर्ज की और साथ ही मेयर का कार्यकाल भी पूरा किया।

फिलहाल, काशीपुर भाजपा की राजनीति में भविष्य की बिसात बिछ चुकी है। आज की गलबहियां, कल की रणनीति बन सकती हैं। और विरोध की पुरानी लकीरें, सत्ता की नई तस्वीर में कभी भी धुंधली पड़ सकती हैं।

काशीपुर में राजनीति अब सिर्फ वर्तमान की नहीं, 2027 की तैयारी का खेल बन चुकी है—जहां हर मुस्कान के पीछे एक सियासी गणित छिपा है।

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