उत्तराखंड

लापता जीतने वाले नेता जब टूरिस्ट बन जाते हैं

लापता जीतने वाले नेता जब टूरिस्ट बन जाते हैं

सामाजिक और राजनीतिक चिंतक रतन सिंह असवाल का एक व्यंग्य

देहरादून।

चुनाव जीतते ही नेताजी का चेहरा ऐसे चमकता है, मानो किसी सरकारी बल्ब की तरह बिजली विभाग से सीधा कनेक्शन मिल गया हो.! जनता सोचती है कि अब उनके इलाके में विकास होगा, लेकिन नेताजी का असली विकास तो एयरपोर्ट लाउंज और पांच सितारा रिसॉर्टों में होता है।
खासकर क्षेत्र पंचायत के प्रतिनिधि,

जिनका हाल यह होता है कि जीत मिलते ही वो अपने ही क्षेत्र में ‘लापता प्रजाति’ की सूची में शामिल हो जाते हैं। मोबाइल पर कॉल कीजिए तो बस यही संदेश सुनाई देता है, आप जिस नेता से संपर्क करना चाहते हैं, वह अभी यात्रा वीज़ा पर व्यस्त है।

घर पर जाइए तो ताला लटका मिलेगा। समर्थक बेचारे परेशान होकर थाने में रिपोर्ट लिखवाते हैं कि, ‘हमारे नेताजी का अपहरण हो गया है’

सोशल मीडिया पर ढेर सारे लाइव वीडियो चलते हैं ! कहीं किसी को थप्पड़ पड़ रहे हैं, कहीं गोलियों की आवाज़, और बीच-बीच में नेताजी के पुराने वादे भी गूँजते रहते हैं, ‘हर हर दल बदल , हर हाथ को काम, हर गाँव का विकास, आदि आदि ।

मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज़ चलती है, जनप्रतिनिधि लापता ! लोकतंत्र पर खतरा,

पुलिस हरकत में आती है, जगह-जगह छापेमारी होती है। लोग सोचते हैं कि शायद लोकतंत्र पर हमला हो गया है।

लेकिन तभी कुछ दिन बाद एक राजनीतिक चमत्कार होता है। नेताजी अचानक प्रकट होते हैं, एकदम फिट, एकदम ताजे, चेहरे पर वो मुस्कान जैसे पांच किलो मलाई खाकर लौटे हों। गले में फूलों की माला, और बयान वही पुराना !
कोई अपहरण नहीं हुआ था, हम तो बस आध्यात्मिक यात्रा पर गए थे।

अब सोचिए ज़रा, किस तरह की आध्यात्मिक यात्रा होती है, जिसमें सारे प्रतिनिधि एक साथ गायब हो जाते हैं? शायद कोई ऐसा योग शिविर जहाँ उन्हें सिखाया जाता हो कि जनता की समस्याओं से दूर रहना ही सबसे बड़ी साधना है। या फिर कोई गुप्त रिट्रीट, जहाँ मंत्र यही हो, जनता को भरोसे में रखो, पर खुद को मतदाताओं से दूर कहीं देश में या देश की सीमा से बाहर विदेश में रखो।

गोया अगली बार जब आपका नेता लापता मिले, परेशान मत होना ।

हो सकता है कि वो लोकतांत्रिक पर्यटन पर गया हो। और जब लौटे, तो वही घिसा-पिटा संवाद दोहराए,

हम गुम नहीं हुए थे, हम तो बस लोकतंत्र को मजबूत करने घूमने गए थे। असल में, नेताजी कभी गुम नहीं होते।

गुम तो बस जनता की उम्मीदें होती हैं।

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