ध्वनि प्रदूषण पर जन-जागरूकता संवाद, नागरिकों को बताए अधिकार और कानूनी उपाय

ध्वनि प्रदूषण से निपटने के लिए नागरिक अपने अधिकारों और कानूनी उपायों को जानें: उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन ने किया जन-जागरूकता संवाद
देहरादून, के विभिन्न हिस्सों से करीब 100 नागरिक ध्वनि प्रदूषण की बढ़ती समस्या पर आयोजित एक जन-संवाद में शामिल हुए। यह कार्यक्रम दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित किया गया। “ध्वनि प्रदूषण: नियम जानें, अपने अधिकार जानें, समाधान का हिस्सा बनें” विषय पर आयोजित इस संवाद का आयोजन उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन ने दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के सहयोग से किया।
उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन हाल ही में गठित नागरिकों का एक समूह है, जो ध्वनि प्रदूषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने, लागू नियमों के पालन को प्रोत्साहित करने, नागरिकों की सूचित भागीदारी को बढ़ावा देने तथा उपलब्ध संस्थागत और कानूनी व्यवस्थाओं के जिम्मेदार उपयोग के लिए काम कर रहा है।
संवाद के दौरान अत्यधिक और लगातार होने वाले शोर के दैनिक जीवन पर प्रभाव, ध्वनि प्रदूषण से जुड़े कानूनी प्रावधान, नागरिकों के अधिकार, पुलिस एवं अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका तथा अत्यधिक शोर की स्थिति में शिकायत दर्ज कराने और उसे आगे बढ़ाने के व्यावहारिक तरीकों पर चर्चा हुई।
वक्ताओं ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण केवल असुविधा या व्यक्तिगत परेशानी का विषय नहीं है। अत्यधिक शोर के लंबे समय तक संपर्क में रहने से नींद, एकाग्रता, काम, मानसिक शांति और समग्र स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। बच्चे, बुजुर्ग, मरीज, गर्भवती महिलाएं और नवजात शिशु लगातार तेज शोर से विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ी भूगोल में लाउडस्पीकर, डीजे और शोर के अन्य स्रोतों की आवाज काफी दूर तक पहुंच सकती है और आसपास के मोहल्लों के साथ-साथ पक्षियों और वन्यजीवों को भी प्रभावित कर सकती है।
कार्यक्रम का संचालन द अननोन इंडिया की प्रबंध संपादक और उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन की सह-संस्थापक कीर्ति अहलावत ने किया। उन्होंने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए इस बात पर चर्चा शुरू की कि नागरिक अपने आसपास ध्वनि प्रदूषण को किस तरह अनुभव करते हैं और अत्यधिक शोर की स्थिति में उन्होंने अब तक क्या कदम उठाए हैं।
उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन के सह-संस्थापक और नवाचार उद्यमी नितिन अहलावत ने ध्वनि प्रदूषण के विभिन्न आयामों और इस समस्या से निपटने में नागरिक भागीदारी के महत्व पर बात की।
उन्होंने कहा कि ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी केवल प्रशासन या पुलिस की नहीं हो सकती। नागरिकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है कि वे नियमों को समझें, उल्लंघनों का उचित दस्तावेजीकरण करें और उपलब्ध संस्थागत व्यवस्थाओं का जिम्मेदारी से उपयोग करें।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अभियान शादियों, समारोहों, व्यवसायों या सामाजिक आयोजनों के खिलाफ नहीं है। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि आयोजनों और व्यावसायिक गतिविधियों के दौरान नियमों का पालन हो और किसी आयोजन के कारण अन्य नागरिकों को लंबे समय तक या अत्यधिक शोर की परेशानी न हो।
सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन के उद्देश्यों और कार्यप्रणाली की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि समूह इस विषय पर सरकारी अधिकारियों और संस्थानों के साथ लगातार संवाद कर रहा है और अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव, नगर आयुक्त, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को करीब 30 अभ्यावेदन दिए जा चुके हैं। उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन ने मालसी और आसपास के क्षेत्रों में स्थित ताज मसूरी फूथिल्स, फेयरफील्ड बाय मैरियट और नुक्कड़ रेस्टोरेंट एंड बार जैसे प्रतिष्ठानों के समक्ष भी यह मुद्दा सीधे उठाया है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन का उद्देश्य केवल लोगों को शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करना नहीं है, बल्कि नागरिकों को यह समझने में मदद करना भी है कि उल्लंघन की पहचान कैसे की जाए, संबंधित साक्ष्य किस तरह जुटाए जाएं और उचित प्राधिकरण के समक्ष व्यवस्थित तरीके से शिकायत कैसे रखी जाए।
संवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अधिवक्ता प्रणव पुरी ने संचालित किया। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण से संबंधित कानूनी प्रावधानों और विभिन्न न्यायिक निर्देशों की जानकारी दी। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत अलग-अलग क्षेत्रों के लिए निर्धारित ध्वनि सीमाओं तथा लाउडस्पीकर और ध्वनि-विस्तारक उपकरणों के इस्तेमाल पर लागू प्रतिबंधों की जानकारी दी।
उन्होंने पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका के बारे में भी बताया तथा अत्यधिक शोर की स्थिति में नागरिकों द्वारा 112 आपातकालीन सेवा से संपर्क करने की प्रक्रिया समझाई। प्रतिभागियों को बताया गया कि शिकायत समय पर करना और समस्या लगातार बनी रहने की स्थिति में उसका उचित रिकॉर्ड रखना महत्वपूर्ण है।
वक्ताओं ने ध्वनि प्रदूषण के दस्तावेजीकरण के व्यावहारिक तरीकों पर भी चर्चा की। नागरिकों को सलाह दी गई कि वे अत्यधिक शोर की तारीख, समय, स्थान, अवधि और स्रोत का रिकॉर्ड रखें। समय अंकित किए गए फोटो और वीडियो, उपलब्ध डेसीबल माप तथा की गई शिकायतों का लिखित रिकॉर्ड समस्या की स्पष्ट समय-रेखा स्थापित करने में उपयोगी हो सकता है। जहां संभव हो, नागरिकों को अन्य प्रभावित पड़ोसियों के साथ मिलकर संबंधित अधिकारियों के समक्ष सामूहिक रूप से अपनी बात रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया।
मेजर जनरल अतुल रावत, एवीएसएम (सेवानिवृत्त) ने बताया कि लगातार होने वाला शोर आवासीय जीवन को किस हद तक प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि अपने घर की खिड़कियों को ध्वनि-रोधक कराने पर उन्होंने काफी खर्च किया है।
विनेश रावत ने तेज संगीत और आतिशबाजी से अपने छोटे पोते-पोतियों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता साझा की। उन्होंने बताया कि मालसी क्षेत्र में कई अन्य परिवार भी ऐसी ही समस्याओं का सामना कर रहे हैं। करुणा थपलियाल ने कुठाल गेट क्षेत्र में एक होमस्टे के पास रहने का अपना अनुभव साझा किया, जहां लगातार होने वाला शोर उनके लिए इतना मुश्किल हो गया कि अंततः उन्हें अपना घर बेचकर कहीं और जाना पड़ा।
कई प्रतिभागियों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। इससे उन नागरिकों की जमीनी परेशानियां सामने आईं जो ऐसे स्थानों के आसपास रहते हैं जहां लाउडस्पीकर, डीजे या आतिशबाजी का इस्तेमाल होता है—इनमें आयोजन स्थल, धार्मिक स्थल, रेस्टोरेंट, होमस्टे और अन्य प्रतिष्ठान शामिल हैं। तपकेश्वर मंदिर के आसपास रहने वाले निवासियों ने तेज संगीत और लाउडस्पीकर से होने वाली बार-बार की परेशानी का उल्लेख किया। एक प्रतिभागी ने बताया कि किस तरह एक बुजुर्ग व्यक्ति को देर रात तक सीमा दीवार के पास लगे लाउडस्पीकर से होने वाली परेशानी के कारण रात पड़ोसी के घर बितानी पड़ी।
चर्चा में यह बात सामने आई कि यह मुद्दा केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं है। इसके साथ जिम्मेदार तरीके से उत्सव मनाने और दूसरों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार का सम्मान करने की संस्कृति विकसित करना भी जुड़ा है।
समापन सत्र में अनूप नौटियाल और नितिन अहलावत ने नागरिकों से अपने आसपास होने वाले अत्यधिक और अनावश्यक शोर के प्रति सजग रहने तथा कानूनी एवं संस्थागत व्यवस्थाओं का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने की अपील की। नागरिकों को उत्तराखंड अगेंस्ट नॉइज़ पॉल्यूशन से जुड़ने और मोहल्ला स्तर पर होने वाले प्रयासों में भाग लेने की जानकारी भी दी गई।
आयोजकों ने बताया कि अभियान के अगले चरण में स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसका उद्देश्य युवाओं को ध्वनि प्रदूषण के प्रभावों के बारे में जागरूक करना और दूसरों के शांति एवं शांत वातावरण में रहने के अधिकार के सम्मान की संस्कृति विकसित करना है। नागरिकों को पड़ोस स्तर पर स्वयंसेवक के रूप में जुड़ने और लगातार होने वाली ध्वनि संबंधी समस्याओं को सामूहिक रूप से उठाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया।
कार्यक्रम का समापन खुले प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने अनुमत ध्वनि स्तर, शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया, पुलिस एवं अन्य अधिकारियों की भूमिका, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल और उपलब्ध कानूनी उपायों से संबंधित प्रश्न पूछे।
कार्यक्रम में विजेंद्र रावत, डॉ. वी.के. डोभाल, जगदंबा प्रसाद मैठाणी, कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष डी.के. पांडे, डॉ. अरुण कुकसाल, अजय शर्मा, सुंदर सिंह बिष्ट, हिमांशु आहूजा, जगदीश बबला, आलोक सरीन और हरि ओम पाली सहित पुस्तकालय की टीम के सदस्य, पाठक, शोधकर्ता और देहरादून के विभिन्न हिस्सों से आए नागरिक उपस्थित रहे।