उत्तराखंड

डिग्री मिली, लेकिन जमीन छूट गई: शिक्षा और पलायन का सच

शिक्षा, रोजगार और पलायन का त्रिकोण..
मैकाले की विरासत और पहाड़ का खालीपन

रतन सिंह असवाल

उत्तराखंड के संदर्भ में एक पुरानी कहावत अक्सर दोहराई जाती है !
पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी, पहाड़ के काम नहीं आती

लेकिन क्या हमने कभी गहराई से सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों है ?
पलायन एक चिंतन अभियान के दौरान जब मैं निर्जन होते गाँवों और बंद पड़े स्कूलों को देखता हूँ, तो समझ आता है कि यह समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि उस मानसिक ढांचे की है जो हमें विरासत में मिला है। आज का संकट दरअसल लॉर्ड मैकाले की उस शिक्षा पद्धति का परिणाम है, जिसने हमें साक्षर तो बनाया, लेकिन हमारे ही घर पहाड़ में ही हमें अजनबी बना दिया।

उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों में कॉलेज तो खुले, लेकिन उनकी शिक्षा का पहाड़ के भूगोल से कोई वास्ता नहीं।हमारे पास ऐसे स्नातक हैं जिन्हें वैश्विक इतिहास तो पता है, लेकिन वे अपने खेतों में उगने वाली औषधीय जड़ी बूटियों, जौनसारी कुमाऊनी या गढ़वाली कला, या उन्नत बागवानी के विज्ञान से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। मैकाले का उद्देश्य ऐसे बाबू बनाना था जो व्यवस्था चला सकें। परिणाम यह हुआ कि आज का युवा खेती को अनपढ़ों का काम समझकर उससे दूरी बना लेता है, जबकि शहरों के औद्योगिक गलियारों के लिए वह तकनीकी रूप से आज भी अकुशल माना जाता है।

हमारी शिक्षा ने सफलता की परिभाषा को दिल्ली नोएडा के 15 हज़ार रू के वेतन तक सीमित कर दिया है। पहाड़ के खेतों में पसीना बहाने वाले को वह सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती, जो शहर में मामूली नौकरी करने वाले को मिलती है। यह सम्मान का संकट ही पलायन का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। जब तक हल चलाने वाले हाथ को शिक्षित और प्रतिष्ठित नहीं माना जाएगा, तब तक युवा अपनी पुरखों की जमीन पर नवाचार करने का साहस नहीं जुटा पाएगा।

पहाड़ की शिक्षा ने युवाओं में आकांक्षाएं तो जगा दीं और वे आगे बढ़ना चाहते हैं, कुछ नया करना चाहते हैं, लेकिन जब वही युवा एग्रो-प्रोसेसिंग या ईको-टूरिज्म के क्षेत्र में उतरना चाहता है, तो उसे गुणवत्ता के मानकों पर खरी उतरने वाली सड़कों, कभी भी गुल हो जाने वाली बिजली और बाजार की कमी का सामना करना पड़ता है। औद्योगिक विकास तराई (रुद्रपुर, हरिद्वार) तक सिमट कर रह गया है, जिससे पहाड़ों से मैदानों की ओर एक आंतरिक पलायन की लहर चल पड़ी है।

इस असंतुलन को दूर करने के लिए हमें मैकाले के ‘वन साइज फिट्स ऑल’ मॉडल को तोड़कर पहाड़ केंद्रित शिक्षा की ओर बढ़ना होगा । क्षेत्रीय शिक्षा के माध्यम से स्कूलों में बागवानी, आपदा प्रबंधन और जड़ी-बूटी विज्ञान को केवल विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने का कौशल को आधार बनाना होगा । स्थानीय उत्पादों के प्रसंस्करण को प्रतिष्ठा से जोड़ना होगा साथ ही शिक्षा ऐसी हो जो आत्मनिर्भर बनाएँ न कि केवल नौकरी का मोहताज बनकर रहे ।

रिवर्स माइग्रेशन के दावों के शोर में यही कहा जा सकता है कि, जो लोग शहरों से अनुभव और पूंजी लेकर अपने गांव लौटना चाहते हैं, उनके लिए सिंगल विंडो सिस्टम और विशेष सब्सिडी दी जाये, ताकि वे वापस आकर रोजगार के केंद्र बन सकें।

पलायन रोकना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हमारी सामूहिक चेतना का विषय है। हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ पहाड़ का युवा गर्व से कह सके कि उसने अपनी शिक्षा का उपयोग अपनी माटी को संवारने के लिए किया है। जब तक शिक्षा पहाड़ की मिट्टी की महक से नहीं जुड़ेगी, तब तक पलायन का यह सिलसिला नहीं थमेगा ।

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