उत्तराखंड

आत्ममुग्धता की चासनी…सोशल मीडिया का गटर और हमारी जिम्मेदारी…!

आत्ममुग्धता की चासनी..
सोशल मीडिया का गटर और हमारी जिम्मेदारी…!

उत्तराखंड।

लेखक: रतन सिंह असवाल
आज के डिजिटल युग में, “आत्ममुग्धता” (Narcissism) एक ऐसी लुभावनी चासनी बन गई है, जिसमें हर कोई डुबकी लगाकर इसके काल्पनिक रस को चूसना चाहता है। यह आकर्षण लाइक्स, कमेंट्स और शेयर की तात्कालिक संतुष्टि से आता है। लेकिन, कड़वा सच यह है कि जब व्यक्ति इस चासनी की कड़ाई में गोता लगाता है, तब उसे एहसास होता है कि उसने शहद की मिठास में नहीं, बल्कि किसी गंदगी के गटर में छलाँग लगा दी है।

सोशल मीडिया का बदलता स्वरूप
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोशल मीडिया का स्वरूप, जो कभी विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम था, अब काफी हद तक एक वैचारिक ‘गटर’ जैसा दिखने लगा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण सतही जुड़ाव है। लोग बिना सोचे-समझे, बिना पढ़े या विषय की गंभीरता को जाने, केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की आत्ममुग्धता में कमेंट और लाइक करते हैं। यह प्रवृत्ति बौद्धिक खोखलेपन को दर्शाती है।

व्हाट्सएप का मायाजाल
इस परिदृश्य में सबसे खतरनाक स्थिति व्हाट्सएप जैसे बंद मैसेजिंग प्लेटफॉर्म की है। यहाँ जो सामग्री परोसी जा रही है—अपुष्ट सूचनाएं, भ्रामक प्रचार और नफरत से भरे संदेश—वह हमारे सामाजिक ताने-बाने को तार-तार करने का काम कर रही है। यह एक ऐसा मायाजाल है जो बंद कमरों में हमारे समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है।

वयस्कों और युवाओं के लिए एक आह्वान
मैं आज के वयस्क युवाओं से विशेष रूप से यही कहूँगा कि इस डिजिटल गटर में अपनी बौद्धिकता को बचाए रखें। किसी भी सामग्री पर प्रतिक्रिया देने से पहले उसे देख-भाल कर, सोच-समझकर अपनी प्रतिक्रिया दें। आपकी यह सचेत प्रतिक्रिया न केवल आपको इस भीड़ का हिस्सा बनने से बचाएगी, बल्कि आपके अपने बौद्धिक स्तर को भी बढ़ाएगी। हर चमकती चीज पर टिप्पणी करना आवश्यक नहीं है।

माता-पिता का अनिवार्य कर्तव्य
अंत में, मेरा उन सभी माता-पिता से आग्रह है जिनके बच्चे अभी छोटे हैं और इस डिजिटल दुनिया में कदम रख रहे हैं। यह आपकी जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों के चैटबॉक्स नियमित रूप से चेक करते रहें। इस सतर्कता का आशय जासूसी करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आपका बच्चा कहीं “अनवांटेड सामग्री की चाशनी के मायाजाल” में तो नहीं फँस रहा है।

आत्ममुग्धता की यह चासनी क्षणिक सुख दे सकती है, लेकिन यह हमें एक गहरी वैचारिक गंदगी की ओर धकेल रही है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस गटर का हिस्सा बनें या अपनी बौद्धिक चेतना से इसे साफ करने का प्रयास करें।

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