ग्लोबल एआई समिट में ‘रोबोटिक डॉग’ विवाद: गलगोटिया पर वैज्ञानिक छवि धूमिल करने का आरोप

गलगोटिया को मैं लानत भेजता हूं ….।
प्रमोद शाह का एक तथ्य परख आलेख
किस प्रकार चतुर्थ ग्लोबल ए.आई इम्पैक समिट जो कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने का एक शानदार अवसर था, जिसके आयोजन के लिए भारत सरकार ने 10372 करोड रुपए की धनराशि भी आवंटित की थी। ग्लोबल भागीदारी की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण सम्मेलन था, जिसमें 20 राष्ट्राध्यक्षो सहित विश्व के कुल 118 देशों ने भगीदारी की, निवेश आकर्षित करने की दृष्टि से यह सम्मेलन सफल भी रहा, प्राइवेट सेक्टर से 250 बिलीयन डॉलर का निवेश आधार भूत संरचना विकास, तथा 20 बिलियन डॉलर का निवेश गहन तकनीक विकास के लिए प्राप्त हुआ, प्राइवेट प्लैयर्स में रिलायंस, अडानी के साथ माइक्रोसॉफ्ट की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण दिल्ली ए .आई डिक्लेरेशन में 86 देशो के हस्ताक्षर हैं। जिन्होंने ए आई के विकास को मनुष्य के कल्याण पर केद्रित रखने में सहमति प्रकट की ।
इस आयोजन में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना गलगोटिया विश्वविद्यालय द्वारा कपट पूर्ण तरीके से कारित की , जब उन्होंने मात्र ढाई लाख रुपए के एक रोबोटिक डाग को न केवल अपना अनुसंधान बताया,बल्कि उसके विकास में 350 करोड रुपए खर्च होने का दावा भी किया ,यह प्रकरण 140 गुणा भ्रष्टाचार से अधिक महत्वपूर्ण, राष्ट्र की वैज्ञानिक चेतना को शर्मसार करने वाला रहा, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धूमिल किया। इसके लिए मैं गलगोटिया विश्वविद्यालय को लानत भेजता हूं।
गलगोटिया के इस कृत्य से भारत की वैज्ञानिक चेतना निराश है, मैं उन्हें निराशा छोड़ वैज्ञानिक अनुसंधान मैं सतत बने रहने का निवेदन करना चाहता हूं क्योंकि आजाद भारत की तकनीक एवं वैज्ञानिक विकास की गाथा बेहद गौरवपूर्ण हैं आईए उसका स्मरण करते है।
एक गरीब लेकिन मजबूत संकल्प के राष्ट्र के रूप में भारत ने जब अपना सफर शुरू किया तब होमीजहांगीर भारत को तत्कालीन विश्वपटल में परमाणु ऊर्जा से संपन्न राष्ट्र बनाने का सपना देखा, 1948 में भारत ने अपना परमाणु ऊर्जा आयोग गठित किया, और 1956 में ही भारत ने अपना पहला परमाणु रिएक्टर अप्सरा बना लिया। जहांगीरहोमी भाभा के इस स्वप्न को पूरा करने मे भारत ने अपनी पूरी प्राण प्रतिष्ठा लगा दी आज भारत के पास 23 परमाणु रिएक्टर हैं, हम दो बार पोखरण में सफल परमाणु बम का परीक्षण कर चुके हैं और परमाणु ऊर्जा से हमें आज 6780 मेगावाट बिजली प्राप्त हो रही है।
भारत की महत्वपूर्ण उपलब्धि रक्षा अनुसंधान के क्षेत्रमें भी रही है,हमने अपनी रक्षा जरूरत को स्वयं पूरा करने की दृष्टि से वर्ष 1958 में डी.आर,डी,ओ का गठन किया भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौर में जब पेटेंट टैंक भारत के लिए मुश्किल बन रहे थे, पश्चिम हमें ऐसी मिसाइल देने के लिए आनाकानी कर रहा था, तब स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने मिसाइल मैन अब्दुल कलाम आजाद को पेटेंट टैंक का एक टुकड़ा देकर उसे भेदने का लक्ष्य दिया मिसाइल मैन की वैज्ञानिक टीम ने दिन रात एक कर दिया ,कहा “हम सब कुछ एक साथ विकसित करेंगे, चाहे कितनी भी चुनौतियाँ आएं।” IGMDP के तहत पाँच मिसाइलें बनीं – अग्नि, पृथ्वी, आकाश, त्रिशूल और नाग ।
अंतरिक्ष क्षेत्र में इसरो जो 1969 में स्थापित हुआ के हिस्से भी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं।
आर्यभट्ट (1975) – पहला भारतीय उपग्रह।
SLV-3 (1980) – पहला स्वदेशी लॉन्च व्हीकल।
चंद्रयान-1 (2008) – चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज (CHACE पेलोड से) – NASA ने भी स्वीकार किया।
मंगलयान (Mangalyaan, 2013-14) – पहली कोशिश में भारत मंगल की कक्षा में पहुँचा।
वैक्सीनेशन के क्षेत्र में भी भारत के हिस्से में बड़ी उपलब्धियां हैं जिसका महत्व कोरोना वैक्सीन के समय समझ में आया।
जब विश्वकप्यूटर के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा था तब भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई थी।
आज भारत में 43 लाख कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, यह विश्व का 18% है ,यह अमेरिका के बाद नंबर दो का आंकड़ाहै, जबकि अमेरिका की सिलिकॉन वैली में भी 28 प्रतिशत भारतीय इंजीनियर हैं। जिनकी औसत आमदनी अमेरिकन से ज्यादा है । जहां सत्या नडेला,सुंदर पिचाई, अरविंद कृष्णा जैसे सभी बड़े नाम भारतीय ही हैं।
ए,आई के इस अंतरराष्ट्रीय अवसर पर जिस प्रकार गलगोटिया विश्वविद्यालय ने भारत को अपमानित किया उसके लिए उसे माफ नहीं किया जा सकता, लेकिन हमें और हमारे मानव संसाधन को निराश होने की भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हम एक वैज्ञानिक चेतना संपन्न राष्ट्र हैं, गलगोटिया ना तो भारत का प्रतिनिधित्व करता है और न ही वह भारत का प्रतिनिधि हो सकता है ।